केलोग्लान की कहानियाँ तुर्की के गाँवों की धूल, चूल्हे की महक और एक गरीब माँ के ममतामयी आँचल से लिपटी हुई हैं।केलोग्लान और जादुई चक्की की कहानी भी बड़ी रोमांचक है । केलोग्लान कोई राजकुमार नहीं है, न ही उसके पास कोई जादुई तलवार है। वह तो एक साधारण, गंजा लड़का है, जिसके पास अगर कुछ है, तो वह है उसकी हाजिरजवाबी और एक अटूट आत्मविश्वास।
यहाँ केलोग्लान की एक ऐसी ही दास्ताँ है, जो दिखाती है कि कैसे एक ‘मूर्ख’ समझा जाने वाला लड़का अपनी भावनाओं और बुद्धि से तक़दीर बदल देता है। तुर्की के एक सुदूर गाँव में एक टूटी-फूटी झोपड़ी थी, जहाँ केलोग्लान अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहता था।

गाँव वाले उसे ‘केलोग्लान’ यानी ‘गंजा लड़का’ कहकर चिढ़ाते थे। उसकी माँ अक्सर परेशान रहती कि उसका यह बेटा दिन भर धूप में लेटा रहता है या चिड़ियों से बातें करता है। वह सोचती, “मेरे बाद इसका क्या होगा? यह तो दुनिया की चालाकी समझता ही नहीं।”एक बार गाँव में भीषण अकाल पड़ा। खाने का दाना न बचा। माँ ने अपनी आखिरी जमापूंजी—एक चांदी का सिक्का—केलोग्लान को दिया और कहा, “बेटा, शहर जा और कुछ अनाज ले आ, वरना हम भूख से मर जाएँगे।
“केलोग्लान अपनी फटी हुई टोपी पहनकर निकल पड़ा। रास्ते में उसने देखा कि कुछ लड़के एक नन्हे कछुए को पत्थर मार रहे थे। केलोग्लान का दिल भर आया। उसने उन लड़कों से कहा, “इसे छोड़ दो, यह बेचारा बेजुबान है।” लड़कों ने मजाक उड़ाया, “हटो यहाँ से गंजे! अगर यह कछुआ चाहिए, तो हमें वह चांदी का सिक्का दे दे।”केलोग्लान के सामने दो भावनाएँ थीं—एक तरफ माँ की भूख और दूसरी तरफ उस नन्ही जान की तड़प। उसने एक गहरी साँस ली और वह आखिरी सिक्का उन लड़कों को दे दिया।

कछुए को झाड़ियों में सुरक्षित छोड़कर वह खाली हाथ घर की ओर मुड़ा। उसे डर लग रहा था, उसकी आँखों में आँसू थे कि वह माँ को क्या मुँह दिखाएगा।तभी एक बूढ़ा फकीर उसे रास्ते में मिला। फकीर ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, तुमने जो दया दिखाई है, वह दुनिया के किसी भी अनाज से कीमती है। यह पुरानी हाथ-चक्की ले जाओ।”केलोग्लान ने उस भारी पत्थर की चक्की को कंधे पर लादा और घर पहुँचा। माँ उसे खाली हाथ देखकर रोने लगी, “बेटा, हम पत्थर चबाएंगे क्या?”
केलोग्लान ने उदास होकर उस चक्की को घुमाना शुरू किया। अचानक, चक्की के अंदर से सुरीली आवाज़ निकली और पत्थर के पाटों के बीच से सोने की मुहरें नहीं, बल्कि ताज़ा और गरम रोटियाँ निकलने लगीं!

कुछ ही दिनों में केलोग्लान का घर खुशियों से भर गया। उसने वह खाना पूरे गाँव में बाँटना शुरू किया। लेकिन जहाँ भलाई होती है, वहाँ ईर्ष्या भी होती है। गाँव के लालची ज़मींदार को जब यह पता चला, तो उसने अपने आदमियों को भेज कर जबरदस्ती अपने महल मंगवा ली ।
जब केलोग्लान को पता चला कि उसकी माँ की मेहनत और उस फकीर का आशीर्वाद चोरी हो गया है, तो उसे पहली बार बहुत क्रोध आया। पर वह लड़ने नहीं गया। उसने अपनी माँ से कहा, “माँ, दुनिया जिसे कमजोरी कहती है, मैं उसी को अपनी ताकत बनाऊंगा।”वह ज़मींदार के महल पहुँचा। ज़मींदार उस समय चक्की घुमाने की कोशिश कर रहा था, पर उससे सिर्फ काला धुआँ निकल रहा था।
केलोग्लान ने बाहर से चिल्लाकर कहा, “मालिक! वह चक्की लौटा दीजिए,वह गरीबों की मदद के लिए चलती है । उसे चलाने वाले के मन में दूसरों के लिए प्यार होना जरूरी है ।
“लालच में अंधा ज़मींदार कहां मानने वाला था उसने केलोग्लान को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया और उसे महल में बंद कर दिया । जमींदार उससे चक्की को चलाने का मंत्र बताने का दबाव डालने लगा ।
आखिरकार केलोग्लान ने जिस फरिश्ते ने उसे यह जादूई चक्की दी उनसे ज़मींदार को सबक सिखाने की प्रार्थना की । चक्की अब तक जो धुआं उगल रही थी अब नमक बिखेरने लगी ।

चक्की से अचानक इतना नमक निकलने लगा कि पूरा कमरा नमक से भरने लगा कि यदि उसे रोका न गया तो पूरे महल को नमक के ढेर में बदल देगा । अब ज़मींदार घबरा गया और केलोग्लान को कैद से बाहर निकाल कर माफ़ी माँगने लगा।
ज़मींदार और उसके परिवार केलोग्लान को चक्की रोकने और फिर कभी गरीबों का हक नहीं मारने और खुद भी सेवा में शामिल होने का भरोसा दिया। केलोग्लान के चक्की को हाथ लगाते ही नमक बंद हो गया और फिर से वह ताजी रोटियां देने लगी ।
ज़मींदार ने राहत की सांस ली और अपने महल का एक हिस्सा गरीबों की सेवा के लिए दे दिया । केलोग्लान को भी महल में रहने की पेशकश की लेकिन केलोग्लान साधारण लड़का था। महल की सुख-सुविधाएँ उसे नहीं चाहिए थीं। उसे बस अपनी माँ की मुस्कुराहट और गांव वालों का साथ चाहिए था।

यह कहानी हमें यह नहीं सिखाती कि जादू होता है, बल्कि यह सिखाती है कि संवेदना (Empathy) ही असली जादू है। केलोग्लान का ‘गंजापन’ प्रतीकात्मक है—इसका मतलब है कि उसके पास छुपाने के लिए कुछ नहीं है, वह पारदर्शी है। जहाँ दुनिया चालाकी को बुद्धिमानी मानती है, वहीं केलोग्लान अपनी मासूमियत और दयालुता से यह सिद्ध करता है कि एक निश्छल मन सबसे बड़ी चुनौतियों को भी पार कर सकता है।

