यह कहानी जयंत की धृष्टता गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के अरण्यकांड के प्रारंभ में और वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में माता सीता के मुख से वर्णित है। यह प्रसंग प्रभु श्रीराम की असीम शक्ति, न्यायप्रियता और उनके शरणागत वत्सल (शरण में आए हुए की रक्षा करने वाले) स्वभाव को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रकट करता है।
पृष्ठभूमि
वनवास के शुरुआती दिनों में प्रभु श्रीराम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण चित्रकूट के रमणीय जंगलों में निवास कर रहे थे। मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित यह स्थान अत्यंत शांत, पवित्र और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण था। यहाँ प्रभु श्रीराम एक साधारण तपस्वी की तरह सात्विक जीवन जी रहे थे। एक दिन, प्रभु श्रीराम माता सीता के साथ एक सुरम्य वृक्ष की छाया में विश्राम कर रहे थे।

श्रीराम ने वन के सुंदर फूलों को चुनकर अपने हाथों से एक सुंदर माला बनाई और बड़े प्रेम से उसे माता सीता के केशों में सजाया। चारों ओर एक अत्यंत शांत और अलौकिक वातावरण था। लक्ष्मण जी कुछ ही दूरी पर सजग होकर पहरा दे रहे थे।
जयंत का आगमन और कुटिल बुद्धि
उसी समय देवराज इंद्र का पुत्र ‘जयंत’ वहाँ से गुजर रहा था। वह स्वभाव से अत्यंत अभिमानी, चंचल और मंदबुद्धि था। वनवासी भेष में प्रभु श्रीराम को इस तरह साधारण मनुष्यों की भांति फूलों की माला बनाते और गृहस्थ जीवन जीते देख, जयंत के मन में एक कुटिल विचार आया।
उसके मन में अहंकार जाग उठा कि क्या सचमुच यह साधारण सा दिखने वाला मानव ही संपूर्ण ब्रह्मांड का स्वामी और साक्षात नारायण है? उसने एक मायावी कौए (वायस) का रूप धारण किया और चुपके से उस स्थान पर आ गया जहाँ श्रीराम और सीता जी बैठे थे।
धृष्टता और माता सीता पर प्रहार

कौए के रूप में जयंत माता सीता के अत्यंत समीप आ गया। उसने अपनी मर्यादा और विवेक को पूरी तरह खो दिया था। अपनी मूर्खतापूर्ण साहस के बल से माता सीता के कोमल चरणों में अपनी नुकीली चोंच से जोर से प्रहार कर दिया।
चोंच लगते ही माता सीता के पैर से रक्त की धारा बह निकली। माता सीता को असहनीय पीड़ा हुई और उनके मुख से एक चीख निकल गई। प्रभु श्रीराम अपनी प्रिय पत्नी की करुण पुकार और उनके पैरों से बहते रक्त को देखा ।
श्रीराम ने देखा कि एक कौआ सामने खड़ा है, जिसकी चोंच पर रक्त लगा हुआ है। अंतर्यामी प्रभु तुरंत समझ गए कि यह कोई साधारण पक्षी नहीं, बल्कि देवताओं के राजा इंद्र का पुत्र जयंत है, जो रूप बदलकर अधर्म और दुस्साहस कर बैठा है।
श्रीराम का क्रोध और सींक का ब्रह्मबाण
माता सीता के प्रति इस घोर अपराध और जयंत के अहंकार को देखकर दयानिधान श्रीराम के मुख पर भयंकर क्रोध छा गया। यद्यपि प्रभु के पास उस समय उनके दिव्य धनुष-बाण पास में नहीं थे, फिर भी उन्होंने जयंत को दंड देने का निश्चय किया।श्रीराम ने जमीन से एक साधारण सूखी घास की सींक (कुश) उठाई।

उन्होंने उस साधारण सी सींक पर मंत्रोच्चार किया और उसे अमोघ ‘ब्रह्मबाण’ के रूप में अभिमंत्रित करके जयंत की ओर छोड़ दिया। वह साधारण सी दिखने वाली सींक साक्षात काल के समान धधकती हुई अग्नि का रूप ले चुकी थी और जयंत का पीछा करने के लिए आगे बढ़ी।
तीनों लोकों में हाहाकार और शरण की खोज
अग्नि उगलते उस बाण को अपने पीछे आता देख जयंत के होश उड़ गए। वह अपने असली रूप में आया और जान बचाने के लिए आकाश में तीव्र गति से भागा।
वह सबसे पहले अपने पिता देवराज इंद्र के पास स्वर्गलोक पहुंचा और रक्षा की गुहार लगाई। लेकिन इंद्र ने जैसे ही देखा कि यह साक्षात प्रभु श्रीराम का ब्रह्मबाण है, उन्होंने अपने पुत्र को फटकारते हुए कहा, “जिसने स्वयं साक्षात काल को चुनौती दी हो, उसकी रक्षा करने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है।” श्रीराम के बाण का सामना करने की शक्ति पूरे ब्रह्मांड में किसी के पास नहीं थी।
“राखि न सकइ कोउ राम कर द्रोही। मातु पिता संकर सुर जोही॥”
(अर्थात: श्रीराम से द्रोह करने वाले को माता-पिता, शिव, या कोई भी देवता नहीं बचा सकता।)जयंत भय से कांप रहा था, वह थक चुका था और मौत उसके बिल्कुल करीब थी। उसे पूरे ब्रह्मांड, चौदह भुवनों और तीनों लोकों में कहीं भी सिर छुपाने की जगह नहीं मिली।
देवर्षि नारद का परामर्श और आत्मसमर्पण
जब जयंत मृत्यु के मुख में था और पूरी तरह हताश हो चुका था, तब रास्ते में उसकी भेंट परम ज्ञानी देवर्षि नारद से हुई। व्याकुल और रोते हुए जयंत ने नारद जी के पैर पकड़ लिए।
नारद जी को उस पर दया आ गई।नारद जी ने कहा, “मूर्ख! तुम जिससे डरकर पूरे ब्रह्मांड में भाग रहे हो, उनके अतिरिक्त तुम्हें कोई नहीं बचा सकता।
प्रभु श्रीराम जितने न्यायप्रिय और प्रतापी हैं । यदि तुम सच्चे मन से अपनी भूल स्वीकार कर उनके चरणों में गिर जाओ, तो वे तुम्हें अवश्य क्षमा कर देंगे। जीवन की भीख मांगनी है, तो वापस चित्रकूट जाओ।”

जयंत को अपनी भूल का अहसास हो चुका था और उसका सारा अहंकार चूर-चूर हो गया था। वह तुरंत वापस चित्रकूट की ओर भागा और तीव्र गति से आकर प्रभु श्रीराम के चरणों में गिर पड़ा। वह त्राहिमाम-त्राहिमाम (रक्षा करो, रक्षा करो) पुकारते हुए और अपनी धृष्टता के लिए क्षमा मांगने लगा।
जीवनदान और दंड
करुणामयी श्रीराम ने जब अपने ही शत्रु को इस प्रकार अत्यंत दीन-हीन अवस्था में अपने चरणों में गिरा देखा, तो उनका क्रोध शांत हो गया। प्रभु ने उसे अभयदान (जीवनदान) देने का मन बनाया। परंतु, श्रीराम का छोड़ा हुआ ब्रह्मबाण कभी निष्फल या खाली नहीं जा सकता था । श्री राम ने जयंत से कहा, “जयंत! तुम मेरी शरण में आए हो, इसलिए मैं तुम्हारे प्राण तो नहीं लूँगा। परंतु मेरा यह बाण व्यर्थ नहीं जा सकता। न्याय के सिद्धांत के अनुसार, तुम्हें तुम्हारी इस धृष्टता का दंड अवश्य भुगतना होगा।”

प्रभु की आज्ञा से उस दिव्य बाण ने जयंत की एक आंख को भेद दिया (उसे फोड़ दिया)।
इस प्रकार, जयंत के प्राण तो बच गए, लेकिन उसे अपने अपराध की सजा के रूप में अपनी एक आंख गंवानी पड़ी। कहा जाता है कि तभी से कौओं की एक ही आंख (काण) होने की लोक-मान्यता प्रचलित हुई।
निष्कर्ष और सीख
जयंत प्रभु श्रीराम को धन्यवाद देता हुआ और उनकी जय-जयकार करता हुआ वापस स्वर्गलोक लौट गया।
रामायण का यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कभी भी किसी की बाहरी वेशभूषा या सादगी को देखकर उसके सामर्थ्य को कम नहीं आंकना चाहिए। चाहे कितना भी बड़ा अपराध क्यों न हो गया हो, यदि मनुष्य सच्चे मन से पश्चाताप करके ईश्वर की शरण में जाता है, तो प्रभु उसे न्यायोचित दंड देकर भी अंततः स्वीकार कर ही लेते हैं।


