​एक सुबह, हिमालय की कंदराओं में ध्यान मग्न देवर्षि नारद के मन में एक विचार बिजली की तरह कौंधा। वे त्रिलोक के भ्रमणकारी थे, नारायण के परम भक्त थे, लेकिन आज उनके भीतर एक सूक्ष्म अहंकार ने जन्म ले लिया था। उन्हें लगा कि उन्होंने काम, क्रोध और मोह पर पूरी तरह विजय पा ली है।

​जब वे क्षीर सागर में भगवान विष्णु से मिले, तो मुस्कराते हुए बोले, “प्रभु, आपकी यह माया जिसका गुणगान पूरा संसार करता है, वह आखिर है क्या? मैं तो इसे कभी महसूस ही नहीं कर पाता। क्या यह मुझ जैसे सन्यासी को भी प्रभावित कर सकती है?”

​विष्णु जी के अधरों पर वह रहस्यमयी मुस्कान उभरी जो ब्रह्मांडों को थामे हुए थी। उन्होंने कहा, “नारद, माया को शब्दों से नहीं, अनुभव से समझा जाता है। चलिए, आज धरती के भ्रमण पर चलते हैं।”

​वह तपती दोपहर और प्यास का बहाना

​दोनों मरुभूमि (रेगिस्तान) के एक सुनसान रास्ते पर चल रहे थे। दोपहर की चिलचिलाती धूप शरीर को झुलसा रही थी। अचानक विष्णु जी एक बरगद के पेड़ की छांव में बैठ गए और हांफते हुए बोले, “नारद, बहुत प्यास लगी है। कंठ सूख रहा है। क्या पास के उस गांव से थोड़ा जल ला सकोगे?”

​नारद ने तुरंत कमंडल उठाया और तेज कदमों से गांव की ओर चल दिए। जैसे ही वे गांव की सीमा पर पहुंचे, उन्हें एक कुआं दिखा। वहां एक युवती पानी भर रही थी। उसकी आंखों में एक अजीब सी सौम्यता थी और चेहरे पर सादगी। उसे देखते ही नारद जैसे अपनी सुध-बुध खो बैठे।

​जिस प्यास को बुझाने के लिए वे आए थे, उसे भूलकर वे उस युवती से बात करने लगे। बातों-बातों में पता चला कि वह उस गांव के मुखिया की बेटी है। नारद, जो अब तक केवल ‘नारायण-नारायण’ का जाप करते थे, उस युवती के सौंदर्य और व्यवहार के मोहपाश में ऐसे बंधे कि उन्होंने वापस जाने का विचार ही त्याग दिया।

​गृहस्थ जीवन की मीठी कैद

​नारद ने अपना सन्यास छोड़ दिया। उन्होंने उस युवती से विवाह किया। अब वे देवर्षि नहीं, बल्कि एक किसान थे। समय बीतता गया। एक साल, दो साल, फिर दस साल। नारद के घर आंगन में बच्चों की किलकारियां गूंजने लगीं। अब उनकी चिंता का विषय ‘मोक्ष’ नहीं, बल्कि ‘मानसून’ था। वे दिन भर खेतों में पसीना बहाते, शाम को बच्चों के साथ खेलते और रात को पत्नी के हाथ का बना भोजन खाकर गहरी नींद सो जाते।

​उन्हें अब यह याद भी नहीं था कि वे कभी स्वर्ग लोक के वासी थे। उनके लिए संसार बस उनका परिवार, उनकी जमीन और उनके मवेशी थे। वे सुखी थे, और इसी सुख ने उनके भीतर के ‘मुनि’ को गहरी नींद सुला दिया था।

​प्रलय और विलाप

​बारह साल बीत चुके थे। एक रात अचानक मौसम ने करवट बदली। मूसलाधार बारिश होने लगी। गांव के पास की नदी उफान पर आ गई। देखते ही देखते बाढ़ का पानी घरों में घुसने लगा। नारद घबरा गए। उन्होंने एक हाथ से पत्नी का हाथ थामा और दूसरे हाथ से बच्चों को सीने से लगाया। वे पानी की तेज लहरों के बीच सुरक्षित स्थान की तलाश में भागने लगे।

​लेकिन कुदरत का कहर बड़ा क्रूर था। अचानक पानी का एक प्रचंड रेला आया। नारद के हाथ से उनकी पत्नी का हाथ छूट गया। वे चिल्लाए, लेकिन चीख लहरों के शोर में दब गई। फिर एक-एक करके उनके बच्चे भी उनकी आंखों के सामने पानी में बह गए।

​नारद अकेले रह गए। जिस संसार को उन्होंने 12 वर्षों में कड़ी मेहनत से सींचा था, वह पल भर में तबाह हो गया। वे किनारे पर बैठकर जोर-जोर से विलाप करने लगे। वे छाती पीटकर रो रहे थे, “हे विधाता! सब छीन लिया तुमने! मेरा परिवार, मेरा घर, मेरा जीवन… मैं अब किसके लिए जीऊंगा?”

​सत्य का अनावरण

​तभी, उनके विलाप के बीच एक शांत और परिचित स्वर सुनाई दिया— “नारद! मेरा जल कहां है? मुझे बहुत प्यास लगी है।”

​नारद ने चौंककर आंखें खोलीं। न वहां बाढ़ थी, न गांव, न परिवार। वे उसी रेगिस्तान में खड़े थे और सामने भगवान विष्णु उसी बरगद के पेड़ के नीचे बैठे थे।

​नारद हक्के-बक्के रह गए। उनके चेहरे पर अभी भी आंसुओं के निशान थे और दिल अभी भी डूबते बच्चों के गम में धड़क रहा था। विष्णु जी ने शांत भाव से पूछा, “नारद, तुम तो केवल जल लेने गए थे। तुम्हें आधा घंटा लग गया। तुम वहां क्या देख रहे थे?”

​नारद भगवान के चरणों में गिर पड़े। उनकी समझ में आ गया कि जिसे वे 12 साल का लंबा जीवन समझ रहे थे, वह केवल आधे घंटे की एक दिमागी लहर थी। वह माया थी।

​श्री हरि का ज्ञान: मानवीय दृष्टिकोण

​विष्णु जी ने उन्हें उठाकर गले लगाया और बोले, “नारद, यही माया है। यह वह शक्ति है जो सत्य पर पर्दा डाल देती है और जिसे तुम देख रहे थे, उसे ही अंतिम सत्य बना देती है। तुमने मुझसे पूछा था कि क्या यह तुम्हें प्रभावित कर सकती है? जब तक तुम्हारे भीतर ‘मैं’ (अहंकार) है, तब तक माया का अस्तित्व रहेगा। नारद को समझ आ गया कि विष्णु भगवान ने उनके अहंकार के कारण उनकी परीक्षा ली है । उन्हें अपने इस हाल पर हंसी आ गई और दोनों पुनः क्षीर सागर लौट गए ।

नारद को ज्ञान मिला कि:

  • ​माया कोई बाहरी जादू नहीं, बल्कि हमारे मन की एक अवस्था है।
  • ​संसार में रहते हुए भी उससे इस तरह जुड़ा जाए जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी गीला नहीं होता।
  • ​अहंकार ही वह द्वार है जिससे माया प्रवेश करती है।