स्लोवाकिया से भी views आए हैं इसलिए इस सम्मान में Slovakia kids story प्रसिद्ध और खूबसूरत लोककथा “बारह महीने” (The Twelve Months) बच्चों के लिए प्रस्तुत है
एक समय पहले की बात है, स्लोवाकिया के ऊंचे और बर्फीले पहाड़ों के पास एक छोटे से गाँव में मरुश्का नाम की एक युवा लड़की रहती थी। मरुश्का जितनी दिखने में सुंदर थी, उसका मन भी उतना ही साफ और दयालु था।
वह सुबह से लेकर रात तक घर के सारे काम हँसते-हँसते करती थी—पानी लाना, कपड़े धोना, खाना बनाना और घर की सफाई करना।उसी घर में उसकी एक सौतेली माँ और एक सौतेली बहन भी रहती थी, जिसका नाम होलेना था। होलेना स्वभाव से बेहद आलसी, घमंडी और ईर्ष्यालु थी। वह दिनभर आईने के सामने बैठी रहती और मरुश्का पर हुक्म चलाती थी।
सौतेली माँ अपनी सगी बेटी होलेना से बहुत प्यार करती थी और मरुश्का से नफरत करती थी, क्योंकि मरुश्का की सुंदरता और अच्छाई के आगे होलेना फीकी लगती थी। माँ और बेटी मिलकर हर दिन मरुश्का को तंग करने की नई-नई योजनाएँ बनाती थीं। होलेना के मन में मरुश्का को परेशान करने का एक दुष्ट विचार आया। उसने मरुश्का से कहा, “मरुश्का! जाओ और जंगल से मेरे लिए ताजे बैंगनी रंग के वॉयलेट (Violet) के फूल लेकर आओ।

मरुश्का हैरान होकर बोली, “प्यारी बहन! तुम यह क्या कह रही हो? यह जनवरी का महीना है। इस भयंकर ठंड और बर्फ में कहीं फूल खिल सकते हैं? सारे पौधे तो बर्फ के नीचे दबे हुए हैं।
सौतेली माँ ने मरुश्का को धक्का देकर घर से बाहर निकाल दिया और दरवाज़ा बंद करते हुए चिल्लाकर कहा, “जब तक तुम बैंगनी फूल लेकर नहीं आओगी, तब तक इस घर में कदम मत रखना!”
जादुई आग और बारह बूढ़े आदमी
बेचारी मरुश्का रोती हुई घने जंगल की ओर चल पड़ी। ठंडी हवाओं से उसका शरीर कांप रहा था और गहरी बर्फ में उसके पैर धंस रहे थे। वह काफी दूर तक भटकती रही ।
जब ठंड से बेहोश होने वाली थी, तभी उसे पहाड़ों की सबसे ऊंची चोटी पर एक टिमटिमाती हुई रोशनी दिखाई दी।उम्मीद की एक किरण पाकर मरुश्का उस रोशनी की तरफ बढ़ने लगी। जब वह चोटी पर पहुँची, तो उसने एक अद्भुत दृश्य देखा। वहाँ एक बहुत बड़ी आग जल रही थी और उस आग के चारों ओर बारह पत्थर रखे हुए थे, जिन पर बारह अजीब लोग बैठे थे।

वे सब आपस में शांत होकर बात कर रहे थे। ये कोई साधारण इंसान नहीं थे, बल्कि साल के बारह महीने थे। इनमें से सबसे लंबी सफेद दाढ़ी वाले ‘जनवरी’ महीने के हाथ में एक जादुई छड़ी (Staff) थी और वे सबसे ऊंचे पत्थर पर बैठे थे।
मरुश्का डरते-डरते आगे बढ़ी और हाथ जोड़कर बोली, “हे भले लोगों! क्या मैं थोड़ी देर आपकी इस आग के पास बैठकर अपना शरीर गर्म कर सकती हूँ? मैं ठंड से मर रही हूँ।”महीने के मुखिया ‘जनवरी’ ने उसकी तरफ देखा और दयालु आवाज में कहा, “पुत्री! तुम इस भयंकर तूफान में यहाँ क्या ढूंढ रही हो?”मरुश्का ने आँसू बहाते हुए कहा, “मेरी सौतेली माँ और बहन ने मुझे जंगल से वॉयलेट के फूल लाने के लिए भेजा है।
अगर मैं फूल लेकर नहीं गई, तो वे मुझे घर में नहीं आने देंगी। कृपया मेरी मदद करें।”
प्रकृति का चमत्कार: वसंत का आगमन
बूढ़े जनवरी ने मुस्कुराते हुए अपनी छड़ी मार्च महीने की तरफ बढ़ाई और कहा, “भाई मार्च, अब कुछ समय के लिए यह गद्दी तुम संभालो।”मार्च महीने ने जादुई छड़ी को अपने हाथ में लिया और उसे जलती हुई आग के ऊपर घुमाया। देखते ही देखते एक चमत्कार हुआ! आग और तेज़ी से भड़क उठी, चोटी पर जमी हुई बर्फ पिघलने लगी, पेड़ों पर हरी पत्तियाँ आ गईं और देखते ही देखते चारों तरफ हरी-भरी घास उग आई।

यह जनवरी के बीच में ‘वसंत’ का जादू था। घास के बीच छोटे-छोटे सुंदर बैंगनी वॉयलेट के फूल मुस्कुराने लगे।मार्च ने मरुश्का से कहा, “जल्दी करो मरुश्का! अपने फूल चुन लो, तुम्हारे पास बहुत कम समय है।”मरुश्का ने खुशी-खुशी ढेर सारे फूल इकट्ठे किए, बारह महीनों को दिल से धन्यवाद दिया और दौड़ती हुई अपने घर लौट आई।
लालच और नई मांगें
जब होलेना और उसकी माँ ने जनवरी के महीने में ताजे और खुशबूदार फूल देखे, तो वे दंग रह गईं। लेकिन उनके मन में मरुश्का के प्रति प्यार जागने के बजाय लालच बढ़ गया। अगले ही दिन होलेना ने फिर से जिद पकड़ी, “जाओ मरुश्का! आज मुझे जंगल से ताजे लाल स्ट्रॉबेरी (Strawberries) खाने हैं।”मरुश्का ने फिर मिन्नतें कीं कि इस मौसम में स्ट्रॉबेरी नहीं मिल सकतीं, लेकिन उसे फिर से डंडे मारकर जंगल में खदेड़ दिया गया। मरुश्का फिर से रोती हुई पहाड़ों की उसी चोटी पर पहुँची।
इस बार जनवरी महीने ने जादुई छड़ी ‘जून’ महीने को सौंप दी।जून ने जैसे ही छड़ी घुमाई, चारों तरफ कड़कती धूप खिली और गर्मी का मौसम आ गया। पेड़ों पर लगी स्ट्रॉबेरी लाल होकर पक गईं। मरुश्का ने अपनी टोकरी भरी और महीनों का आभार मानकर घर लौट आई। तीसरे दिन, होलेना ने ताजे लाल सेब (Apples) लाने की मांग की। इस बार चोटी पर बैठे जनवरी ने अपनी जादुई छड़ी ‘सितंबर’ महीने को दी।

सितंबर के आते ही आसमान में ठंडी हवाएँ चलने लगीं, पत्तों का रंग पीला और लाल होने लगा और सेब के पेड़ फलों से लद गए। सितंबर ने मरुश्का से कहा, “तुम पेड़ से सिर्फ दो सेब गिरा सकती हो, जल्दी करो।” मरुश्का ने दो सेब लिए और घर आ गई। घमंड और लालच का अंतजब होलेना ने वे दो मीठे सेब खाए, तो उसका लालच सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने चिल्लाकर कहा, “सिर्फ दो सेब? तुम जरूर बाकी के सेब खुद खा गई होगी! अब मैं खुद जंगल जाऊँगी और पूरा पेड़ खाली कर दूँगी।
“होलेना ने गर्म कपड़े पहने और अपनी माँ को लेकर गुस्से में जंगल की तरफ निकल पड़ी। पहाड़ों पर चढ़ते हुए उसे भी वही जादुई आग और बारह महीने दिखाई दिए। लेकिन होलेना मरुश्का की तरह विनम्र नहीं थी। वह बिना अनुमति के आग के पास जाकर खड़ी हो गई और घमंड से बोली, “बूढ़ों! हटो, मुझे आग सेकने दो।

“जनवरी महीने ने गंभीर होकर पूछा, “तुम यहाँ क्या लेने आई हो लड़की?”होलेना ने पलटकर झिड़कते हुए कहा, “तुम्हें इससे क्या मतलब, तुम अपना काम करो!” और वह पहाड़ों पर आगे सेब ढूंढने निकल गई।होलेना का यह बुरा और अपमानजनक व्यवहार देखकर जनवरी महीने ने गुस्से में अपनी जादुई छड़ी को हवा में लहराया।
पल भर में आग बुझ गई। आसमान में काले घने बादल छा गए और ऐसा भयंकर बर्फीला तूफान आया कि हाथ को हाथ भी दिखाई देना बंद हो गया। भारी बर्फबारी में होलेना और उसका पीछा करती हुई आई उसकी माँ रास्ता भटक गईं। ठंड और बर्फीले तूफान के कारण वे दोनों हमेशा के लिए उसी बर्फ के नीचे दब गईं।
घर पर मरुश्का अपनी माँ और बहन का इंतजार करती रही, लेकिन वे कभी लौटकर नहीं आईं। अंत में, मरुश्का उस सुंदर घर की मालकिन बनी। वह हमेशा की तरह दयालु रही और बाद में एक अच्छे किसान के साथ शादी करके खुशी-खुशी रहने लगी। जब भी मौसम बदलता, मरुश्का को पहाड़ों वाले वे बारह दयालु बूढ़े लोग याद आते, जिन्होंने उसकी जान बचाई थी।
सीख: यह कहानी हमें सिखाती है कि दयालुता, विनम्रता और संतोष हमेशा इंसान को सुखी बनाते हैं, जबकि लालच, घमंड और दूसरों के प्रति बुरा व्यवहार अंत में इंसान के खुद के विनाश का कारण बनता है।

