कालनेमी vadhकालनेमी वध

​भारतीय महाकाव्य रामायण के युद्ध कांड में कालनेमी वध का प्रसंग हैं जो हमें साहस, भक्ति और बुद्धिमानी का पाठ पढ़ाती हैं। ऐसी ही एक रोमांचक और प्रेरणादायक घटना है— ‘कालनेमी वध’। यह कहानी तब की है जब लंका के रणक्षेत्र में लक्ष्मण जी मूर्छित पड़े थे और हनुमान जी समय के विरुद्ध एक कठिन युद्ध लड़ रहे थे।

​संकट में लक्ष्मण और रावण का भय

​युद्ध के मैदान में मेघनाद ने लक्ष्मण जी पर अमोघ ‘शक्ति बाण’ का प्रयोग किया, जिससे वे गहरे कोमा (मूर्छा) में चले गए। लंका के राजवैद्य सुषेण ने बताया कि सूर्योदय से पहले हिमालय के द्रोणागिरी पर्वत से ‘संजीवनी बूटी’ लानी होगी, अन्यथा लक्ष्मण के प्राण नहीं बचेंगे।

​हनुमान जी पवन की गति से हिमालय की ओर उड़े। इधर लंका में रावण भयभीत हो गया। उसे लगा कि यदि हनुमान संजीवनी ले आए, तो उसकी जीत का सपना टूट जाएगा। रावण ने अपने सबसे चतुर और मायावी मामा, कालनेमि को बुलाया।

​कालनेमि का छद्म भेष और मायावी आश्रम

​रावण ने कालनेमि को आदेश दिया कि वह हनुमान का मार्ग रोके। कालनेमि जानता था कि वह बल में हनुमान का सामना नहीं कर सकता, इसलिए उसने ‘छल’ की योजना बनाई। उसने गंधमादन पर्वत के पास अपनी माया से एक अत्यंत सुंदर और शांत आश्रम का निर्माण किया।

​कालनेमि ने एक परम प्रतापी ऋषि का रूप धारण किया और राम-नाम का जाप करने लगा। जब हनुमान जी उस मार्ग से गुजरे, तो उन्हें राम-नाम की मधुर ध्वनि सुनाई दी। वे अचंभित हुए कि इस दुर्गम मार्ग पर कौन सा महान भक्त रहता है? प्यास और थकान मिटाने के उद्देश्य से हनुमान जी उस ‘कपट मुनि’ के पास जा पहुंचे।

​कपटी साधु और हनुमान की सौम्यता

​हनुमान जी ने साधु (कालनेमि) को प्रणाम किया। कालनेमि ने बड़ी ही चतुराई से हनुमान जी का स्वागत किया और उन्हें राम कथा सुनाने लगा। उसने कहा, “हे वानर वीर! मैं अपनी दिव्य दृष्टि से देख रहा हूँ कि तुम किसी महान कार्य के लिए जा रहे हो। तुम थोड़े समय यहाँ विश्राम करो, भोजन करो और पास के सरोवर में स्नान कर अपनी थकान मिटाओ, फिर जाना।”

​हनुमान जी अपनी सादगी और भक्ति के कारण उसकी बातों में आ गए। कालनेमि का उद्देश्य केवल हनुमान जी का समय व्यर्थ करना था ताकि सूर्योदय हो जाए और संजीवनी का कोई लाभ न रहे।

​सरोवर की मकरी और श्राप मुक्ति

​हनुमान जी जैसे ही सरोवर में स्नान करने उतरे, एक विशाल और भयानक मकरी (मगरमच्छनी) ने उनका पैर पकड़ लिया। वह मकरी कोई साधारण जीव नहीं थी। हनुमान जी ने पलक झपकते ही उस मकरी को पकड़ लिया और जैसे ही उन्होंने उसे मारा, वह एक दिव्य अप्सरा (धान्यमाली) के रूप में बदल गई।

​उस अप्सरा ने हनुमान जी को हाथ जोड़कर कहा, “हे पवनपुत्र! आपने मुझे श्राप से मुक्त कर दिया। मैं आपको सावधान करने आई हूँ। वह साधु जिसे आप महात्मा समझ रहे हैं, वह रावण का भेजा हुआ कालनेमि राक्षस है। वह आपको भ्रमित कर आपका समय नष्ट कर रहा है। शीघ्र यहाँ से प्रस्थान करें!”

​कालनेमी वध और गुरु दक्षिणा

​सत्य जानकर हनुमान जी के क्रोध की सीमा न रही। वे तुरंत उस नकली आश्रम में लौटे। कालनेमि अभी भी आँखें बंद कर जाप का नाटक कर रहा था। हनुमान जी ने उससे कहा, “हे मुनिवर! स्नान हो गया, अब गुरु दक्षिणा का समय है।”

​इससे पहले कि कालनेमि कुछ समझ पाता, हनुमान जी ने अपनी पूँछ से उसे जकड़ लिया। कालनेमि ने अपने असली विशाल राक्षस रूप में आकर युद्ध करने की कोशिश की, लेकिन हनुमान जी के वज्र के समान प्रहारों के सामने वह टिक न सका। हनुमान जी ने उसे जमीन पर पटककर उसका वध कर दिया। मरते समय कालनेमि के मुख से भी ‘राम-राम’ निकला, क्योंकि हनुमान जी के हाथों मृत्यु मिलना भी उसके लिए मोक्ष का द्वार खोल गया।

कालनेमी vadh
कालनेमी वध

​कहानी का आध्यात्मिक और नैतिक संदेश

​कालनेमि वध की यह कथा हमें जीवन के लिए तीन महत्वपूर्ण सबक देती है:

  1. सजगता (Alertness): हर चमकती चीज सोना नहीं होती। धर्म के नाम पर पाखंड करने वाले ‘कालनेमि’ हर युग में होते हैं। हमें अपनी बुद्धि से असली और नकली की पहचान करनी चाहिए।
  2. समय का महत्व: हनुमान जी ने अपनी गलती का एहसास होते ही एक क्षण भी व्यर्थ नहीं किया। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समय प्रबंधन अनिवार्य है।
  3. दैवीय सहायता: यदि आपके इरादे नेक हैं और आप धर्म के मार्ग पर हैं, तो ईश्वर किसी न किसी रूप (जैसे मकरी के रूप में अप्सरा) में आपकी सहायता अवश्य करते हैं।