युद्ध कांड रामायण की कहानी — कुंभकर्ण, मेघनाद वध से रावण वध तक

29 सितंबर 2026
एक नज़र में
| कहानी | स्थान | मुख्य पात्र | स्रोत | पढ़ने का समय | मुख्य सीख |
|---|---|---|---|---|---|
| युद्ध कांड (लंका कांड) | लंका (युद्ध-भूमि) | श्रीराम, रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद (इंद्रजीत), लक्ष्मण, हनुमान, विभीषण | वाल्मीकि रामायण – युद्धकांड | ~13 मिनट | अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, धैर्य और धर्म के साथ की गई मेहनत जीतती है |
युद्ध कांड रामायण की कहानी की दो ज़रूरी बातें
- * रावण जितना विद्वान था, उतना ही अहंकारी भी — अपने ही भाई कुंभकर्ण और मंत्रियों की सही सलाह ठुकराकर उसने अपनी मौत खुद बुलाई (वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड की कथा-परंपरा)।
- * रावण को मारना इतना आसान नहीं था — उसके कटे हुए सिर की जगह हर बार नया सिर उग आता था। आखिर श्रीराम ने उसे कैसे हराया?
युद्ध कांड वाल्मीकि रामायण का छठा और सबसे बड़ा अध्याय है, जिसे लंका कांड भी कहा जाता है — इसमें कुल 128 सर्ग और 5,692 श्लोक मिलते हैं, जो इसे पूरी रामायण का सबसे बड़ा कांड बनाते हैं (वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड)।
इसी कांड में समुद्र पर सेतुबंधन, लंका में वानर-सेना का प्रवेश, कुंभकर्ण और मेघनाद का वध, और अंत में स्वयं श्रीराम के हाथों रावण का वध होता है — यानी अधर्म पर धर्म की सबसे बड़ी और सबसे रोमांचक जीत। तो चलिए, बच्चों, आज डैडी आपको यह पूरी कहानी शुरू से सुनाते हैं।
युद्ध कांड में क्या-क्या होता है?
पूरे युद्ध कांड को समझने के लिए पहले इसकी मुख्य घटनाएँ एक नज़र में देख लेते हैं (वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड):
- चुनौती: रावण का सीता को लौटाने से इनकार और युद्ध की घोषणा
- सेतुबंधन: समुद्र पर पुल बनाकर वानर-सेना का लंका में प्रवेश
- नागपाश-हमला: मेघनाद ने राम-लक्ष्मण को बाँधा, गरुड़ ने बचाया
- कुंभकर्ण वध: रावण के विशालकाय भाई का श्रीराम के हाथों वध
- मेघनाद वध: रावण के पुत्र इंद्रजीत का लक्ष्मण के हाथों वध
- रावण वध: ब्रह्मास्त्र से रावण का अंत — युद्ध कांड की चरम घटना
- परिणाम: श्रीराम की अयोध्या वापसी
विभीषण की शरणागति
वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड के अनुसार, रावण और विभीषण का यह संवाद लंका-दहन के बाद और समुद्र पार करने से पहले लंका के राजदरबार में हुआ था। जब विभीषण ने देखा कि रावण का अहंकार और अधर्म कुल के विनाश का कारण बन रहा है, तो उन्होंने एक सच्चे हितैषी की तरह रावण को समझाने का प्रयास किया।
विभीषण ने अत्यंत विनम्रता से कहा कि माता सीता कोई साधारण स्त्री नहीं हैं और उनके रूप में लंका पर काल मंडरा रहा है। उन्होंने हनुमान जी द्वारा लंका दहन का स्मरण कराते हुए चेतावनी दी कि भगवान श्रीराम की शक्ति असाधारण है, इसलिए सीता जी को ससम्मान लौटाकर क्षमा माँग लेनी चाहिए ताकि लंका और निरीह राक्षसों की जान बच सके।

विभीषण की इन हितकारी बातों को सुनकर अहंकारी रावण गुस्से से लाल हो गया। उसने विभीषण को अपना हितैषी मानने के बजाय कुल का कलंक और शत्रुओं की प्रशंसा करने वाला करार दिया। रावण ने भरी सभा में अपमानित करते हुए यहाँ तक कह दिया कि यदि वह उसका भाई न होता, तो वह उसे अभी मौत के घाट उतार देता और उसे तुरंत लंका से निकल जाने का आदेश दिया।
रावण द्वारा बार-बार अपमानित किए जाने और वध की धमकी मिलने के बाद विभीषण समझ गए कि अब रावण की बुद्धि पूरी तरह भ्रष्ट हो चुकी है और उसका विनाश अटल है।
इसके बाद विभीषण अपने कुछ वफादार मंत्रियों के साथ तुरंत रावण का महल और लंका त्यागकर समुद्र पार कर गए और भगवान श्रीराम की शरण में पहुँचे, जहाँ श्रीराम ने उन्हें प्रेम से गले लगाकर अपनी सेना में शरण दी।
अंगद का पैर हिलाने की घटना
श्रीराम द्वारा भेजे गए दूत अंगद जब रावण की भरी सभा में पहुँचे, तो दोनों के बीच एक अत्यंत कड़ा और प्रभावशाली संवाद हुआ।अंगद ने निडर होकर रावण को समझाया कि वह माता सीता को सहर्ष लौटा दे और श्रीराम की शरण में आकर अपनी और अपनी लंका की रक्षा करे, अन्यथा उसका विनाश निश्चित है।
अंगद के व्यंग्य और तीखे वचनों से क्रोधित होकर रावण ने अपनी सभा के योद्धाओं को आदेश दिया कि इस वानर को तुरंत पकड़ लिया जाए। तब अंगद ने अपनी वीरता का परिचय देते हुए एक चुनौती दी।
उन्होंने अपना पैर पूरी शक्ति के साथ रावण की सभा के बीचों-बीच ज़मीन पर रख दिया और सभा के सभी बड़े-बड़े महारथियों और वीर राक्षसों को ललकारकर कहा, “यदि तुम में से कोई भी मेरे इस पैर को अपनी जगह से हिला दे, तो मैं श्रीराम की ओर से हार मान लूँगा और सीता जी को बिना युद्ध के यहीं छोड़ दूँगा।”

रावण के अहंकारी योद्धाओं और सेनापतियों, जैसे प्रहस्त आदि, ने एक-एक करके आगे बढ़कर अंगद के पैर को अपनी पूरी ताकत से हिलाने का असफल प्रयास किया। यहाँ तक कि रावण के पुत्रों ने भी जोर लगाया, लेकिन कोई भी वीर अंगद के पैर को ज़मीन से इंच भर भी नहीं हिला सका।
अंत में, जब खुद रावण अपमान के मारे क्रोध से काँपते हुए अपने सिंहासन से उठकर अंगद का पैर पकड़ने के लिए आगे बढ़ा, तो अंगद ने अपना पैर खींच लिया और विनीत भाव से कहा, “रावण! मेरे पैर पकड़ने से क्या लाभ? यदि झुकना ही है, तो श्रीराम के चरणों में झुको, वही तुम्हारा उद्धार कर सकते हैं।”
वैसे यह घटना सिर्फ रामचरितमानस में है, वाल्मीकि में नहीं। वाल्मीकि (युद्धकांड 6.31) में चार राक्षस उन्हें पकड़ते हैं और अंगद उन्हें लिए महल की छत पर कूद जाते हैं।
समुद्र पर पुल बनाकर लंका में कैसे पहुँचे श्रीराम?
जब विशाल वानर-सेना के साथ भगवान श्रीराम समुद्र के तट पर पहुँचे, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती इस अथाह जलराशि को पार करने की थी। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने विनयपूर्वक समुद्र देव का आह्वान किया और मार्ग देने की प्रार्थना की। उन्होंने तीन दिनों और तीन रातों तक तट पर प्रतीक्षा की, किंतु समुद्र की ओर से कोई उत्तर नहीं आया।
शांत रहने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम का यह धैर्य जब तीन दिनों तक अनसुना रहा, तो उनका क्षोभ और क्रोध जाग उठा। उन्होंने अपने महाप्रलयकारी धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और एक ऐसा अमोघ बाण संधान किया, जिससे संपूर्ण जलराशियों में हाहाकार मच गया। उस दिव्य बाण के प्रताप से समुद्र का पानी खौलने लगा, बड़े-बड़े जीव तड़पने लगे और समुद्र की गहराई काँप उठी।

श्रीराम के इस रौद्र रूप को देखकर भयभीत समुद्र देव तत्काल काँपते हुए प्रकट हुए। उन्होंने हाथ जोड़कर क्षमा माँगी और स्पष्ट किया कि जड़ प्रकृति का स्वभाव अपनी मर्यादा में बंधा होता है, इसलिए मार्ग देना उनके वश में नहीं था। इसके साथ ही, समुद्र देव ने श्रीराम को एक अमूल्य उपाय सुझाया। उन्होंने बताया कि उनकी सेना में भगवान विश्वकर्मा के अंश से उत्पन्न ‘नल’ नाम के एक अत्यंत कुशल वानर वीर मौजूद हैं। नल के हाथ का स्पर्श पाते ही पानी पर भारी-भरकम पत्थर भी तैरने लगेंगे।
समुद्र देव की इस सलाह को मानकर श्रीराम ने नल को पुल निर्माण का दायित्व सौंपा। नल की देखरेख में वानर-सेना ने उत्साह और जयकारों के साथ पर्वतों और बड़े-बड़े चट्टानों को उखाड़कर समुद्र में डालना शुरू किया। नल की अद्भुत वास्तुकला और वानर-सेना के अदम्य परिश्रम के बल पर देखते ही देखते समुद्र पर सौ योजन लंबा वह ऐतिहासिक सेतु बनकर तैयार हो गया, जिसे आज हम रामसेतु के नाम से जानते हैं।
मेघनाद के नागपाश से राम-लक्ष्मण कैसे बचे?
शुरुआती लड़ाइयों में रावण के कई बड़े सेनापति — जैसे प्रहस्त — वानर-सेना के हाथों मारे गए। तभी रावण के पुत्र मेघनाद, जिसे इंद्रजीत भी कहते हैं, खुद युद्ध में उतरा। मेघनाद माया-युद्ध में माहिर था — वह आकाश में छिपकर, बिना दिखे बाण चलाता था। उसने नागपाश नाम के दिव्य अस्त्र से श्रीराम और लक्ष्मण दोनों को बाँध दिया। यह अस्त्र बाणों की जगह जीवित साँपों में बदलकर दोनों भाइयों को जकड़ लेता था। दोनों भाई मूर्छित होकर गिर पड़े और पूरी वानर-सेना में शोक छा गया।

तभी आकाश से गरुड़ प्रकट हुए — साँपों के परम शत्रु। उन्हें देखते ही सारे साँप (नागपाश) डरकर भाग गए और श्रीराम-लक्ष्मण होश में आ गए (वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड)। मेघनाद इस हार से समझ गया कि अब जल्दी कुछ बड़ा करना होगा, और रावण को यह चिंता सताने लगी कि जब मेघनाद जैसे मायावी योद्धा से भी श्रीराम को स्थायी रूप से रोका नहीं जा सका, तो अब किसे भेजा जाए।
कुंभकर्ण का वध कैसे हुआ?
युद्ध में लगातार हार से परेशान होकर रावण ने अपने बलशाली भाई कुंभकर्ण को नींद से जगवाया। जागते ही कुंभकर्ण को सबसे पहले खाना-पीना परोसा गया — कथा-परंपरा के अनुसार उसने हज़ार घड़े मदिरा पी डाली और ढेरों भैंसों का भक्षण किया, तब जाकर उसका पेट भरा (वाल्मीकि रामायण की कथा-परंपरा)। रावण ने उसे सारी बात बताई। कुंभकर्ण ने पहले तो रावण को समझाया — “भाई, सीता का हरण करके तुमने बड़ा पाप किया है” — लेकिन फिर भी बड़े भाई की आज्ञा मानकर युद्ध में जाने को तैयार हो गया।

मेघनाद (इंद्रजीत) का वध किसने और कैसे किया?
अपने प्रिय भाई कुंभकर्ण की वीरगति और भारी तबाही से विचलित होकर रावण के भीतर शोक और क्रोध का ज्वार उबल रहा था। अपने कुल के इस संकट को टालने के लिए उसने अंततः अपने सबसे शक्तिशाली और मायावी पुत्र, राजकुमार मेघनाद (इंद्रजीत) को रणक्षेत्र में उतरने की अंतिम आज्ञा दी। मेघनाद अपने अजेय अस्त्रों और मायावी शक्तियों के साथ युद्ध-भूमि में उतरा और उसने अपनी कूटनीतिक एवं मायावी युद्ध-कला से पूरी वानर-सेना में हाहाकार मचा दिया।
युद्ध का यह दृश्य अत्यंत डरावना और भीषण होता चला गया, जहाँ मेघनाद ने अदृश्य रहकर ऐसे बाणों की वर्षा की जिससे चहुंओर तबाही मच गई। इसी घमासान और भयंकर मुठभेड़ के दौरान, मेघनाद ने क्रोधित होकर अपने अत्यंत घातक शक्ति-अस्त्र (ब्रह्मशक्ति) का संधान किया।

वह तेजपुंज अस्त्र सीधे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के छोटे भाई, धर्ममूर्ति लक्ष्मण के वक्षस्थल पर आ लगा, जिससे लक्ष्मण जी आहत होकर अचेत हो गए और रणभूमि में ही गिर पड़े।
लक्ष्मण के इस प्रकार मूर्छित हो जाने से पूरी वानर-सेना में शोक की लहर दौड़ गई और स्वयं श्रीराम अपने भाई की इस दशा को देखकर व्याकुल हो उठे। संकट की उस घड़ी में लंका से तुरंत राजवैद्य सुषेन को बुलाया गया, जिन्होंने परीक्षण के बाद गंभीर स्वर में बताया कि लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा केवल हिमालय पर्वत पर उगने वाली दुर्लभ संजीवनी बूटी और विशल्याकरणी जड़ी-बूटी से ही संभव है।
समय अत्यंत कम था और प्राण बचाने की चुनौती बहुत बड़ी थी, इसलिए पवनपुत्र हनुमान ने बिना एक पल गंवाए लंबी छलांग लगाई और गगनचुंबी उड़ान भरते हुए सीधे उत्तर दिशा में स्थित हिमालय पर्वत की ओर प्रस्थान किया।

जब हनुमान जी हिमालय पहुँचे और औषधियों की पहचान करने में असमर्थ रहे, तो उन्होंने अपनी महाशक्ति का परिचय देते हुए पूरे द्रोण पर्वत को ही उखाड़ लिया और अपने हाथों पर उठाकर हवा में उड़ते हुए युद्ध-भूमि तक ले आए। वैद्यों ने तुरंत उस पर्वत से संजीवनी और विशल्या बूटियों को निकाला और लक्ष्मण जी को सूंघाई, जिसके प्रभाव से कुछ ही पलों में उनके गहरे घाव भर गए और वे पूरी तरह स्वस्थ होकर एक बार फिर ऊर्जा के साथ उठ खड़े हुए।
स्वस्थ होते ही लक्ष्मण जी का उत्साह और पराक्रम कई गुना बढ़ गया और वे बिना समय गंवाए सीधे युद्ध-भूमि की ओर दौड़ पड़े। दूसरी ओर, मेघनाद भली-भांति जानता था कि सामान्य युद्ध में लक्ष्मण और श्रीराम को हराना असंभव है, इसलिए वह अपनी अजेय शक्ति प्राप्त करने के लिए नगर के एक गुप्त स्थान पर स्थित निकुम्भिला देवी के मंदिर में महायज्ञ करने बैठ गया। वह गुप्त यज्ञ यदि विधिवत पूरा हो जाता, तो मेघनाद को संसार में कोई भी पराजित नहीं कर पाता।
किंतु, नीतिज्ञ विभीषण इस गुप्त रहस्य से पूरी तरह अवगत थे, और उन्होंने तुरंत यह भेद श्रीराम और लक्ष्मण जी को बता दिया। विभीषण के मार्गदर्शन में लक्ष्मण जी ठीक समय पर अपने बानर सैनिकों के साथ निकुम्भिला देवी के मंदिर जा पहुँचे और चल रहे उस गुप्त यज्ञ को बीच में ही विध्वंस कर दिया।

यज्ञ के खंडित होते ही मेघनाद का सारा घमंड और मायावी कवच छिन्न-भिन्न हो गया। इसके बाद लक्ष्मण जी और मेघनाद के बीच एक अत्यंत भयंकर और अंतिम महासंग्राम छिड़ गया, जिसमें लक्ष्मण जी ने अपने अचूक बाणों का संधान कर रावण के इस दुर्जेय और मायावी पुत्र मेघनाद का अंत कर दिया।
राम और रावण का अंतिम युद्ध कैसे हुआ?
पुत्र मेघनाद की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण टूट गया। शोक और क्रोध में डूबा रावण अब खुद रथ पर सवार होकर मैदान में उतरा। यहीं से रामायण का सबसे भीषण युद्ध शुरू हुआ। श्रीराम जैसे ही रावण का कोई सिर काटते, उसी जगह तुरंत एक नया सिर उग आता था। तब युद्ध के उस निर्णायक मोड़ पर महर्षि अगस्त्य ने श्रीराम को ‘आदित्यहृदय स्तोत्र’ का पाठ करने की सलाह दी, जिससे उन्हें असीम ऊर्जा और शक्ति मिली।

इसके बाद विभीषण ने श्रीराम को रावण की नाभि में अमृत होने का गुप्त रहस्य बताया। ठीक इसी क्षण मातलि श्रीराम को याद दिलाते हैं — “वह बाण प्रयोग लो जो स्वयं अगस्त्य मुनि ने पहले तुम्हें दिया था, आज विनाश का समय आ गया है।” यह बाण मूलतः ब्रह्मा जी ने इंद्र की त्रिलोक-विजय के लिए बनाया था, और बाद में अगस्त्य के ज़रिए श्रीराम तक पहुँचा।
श्रीराम इसी ब्रह्मास्त्र का संधान कर रावण पर छोड़ते हैं — यह सीधे उसके हृदय में लगता है और रावण प्राणहीन होकर रथ से गिर पड़ता है। रावण की मृत्यु के बाद उसकी पत्नियाँ और बचे हुए राक्षस फूट-फूटकर रोने लगे।
श्रीराम ने युद्ध के बाद वैर समाप्त होने की बात कहते हुए विभीषण को आदेश दिया कि वह अपने बड़े भाई का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान के साथ करे, और इसके पश्चात विभीषण का राज्याभिषेक कर उन्हें लंका का राजा घोषित कर दिया। चोट पहुँचाते। — क्योंकि युद्ध खत्म होने के बाद वैर भी खत्म हो जाता है। इसके बाद श्रीराम ने विभीषण का राज्याभिषेक कर उसे लंका का राजा घोषित किया।
राम-रावण युद्ध कितने दिनों तक चला था?
इस पर अलग-अलग मान्यताएं हैं। कुछ ग्रंथों और लोक-परंपरा के अनुसार श्रीराम और रावण के बीच लगातार भीषण युद्ध सिर्फ 8 दिनों तक चला, जबकि कुछ अन्य मान्यताओं में समुद्र-तट पर रुकने और छोटी-मोटी झड़पों को मिलाकर पूरा युद्ध-काल 84 दिनों तक बताया गया है (लोक-मान्यता एवं धार्मिक परंपरा)। दोनों ही मान्यताओं में यह तय है कि रावण का वध आश्विन शुक्ल दशमी को हुआ, जिसे आज विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है।
राम-रावण युद्ध की प्रसिद्ध चौपाई
उत रावन इत राम दोहाई। जयति जयति जय परी लराई॥ निसिचर सिखर समूह ढहावहिं। कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं॥
भावार्थ: एक ओर रावण की और दूसरी ओर श्रीराम की जय-जयकार मच रही है। भयंकर युद्ध चल रहा है — राक्षस पहाड़ों की चोटियाँ तोड़-तोड़कर फेंक रहे हैं, और वानर कूद-कूदकर उन्हें बीच में ही पकड़ लेते हैं और पलटकर राक्षसों पर ही दे मारते हैं। (स्रोत: श्रीरामचरितमानस, लंकाकांड)
इस कहानी से क्या सीख मिलती है?
रावण जितना बड़ा विद्वान था, उतना ही बड़ा उसका अहंकार भी था। अपने भाई विभीषण और कुंभकर्ण की सही सलाह को उसने घमंड में ठुकरा दिया — और यही घमंड आखिरकार उसकी हार का सबसे बड़ा कारण बना। दूसरी तरफ श्रीराम ने हर मुश्किल में धैर्य रखा, अपने साथियों पर भरोसा किया और कभी अधर्म का रास्ता नहीं चुना। कहानी यही सिखाती है — चाहे सामने वाला कितना भी ताकतवर क्यों न हो, धैर्य, सही साथी और धर्म का रास्ता आखिर में जीतता ही है।
A Thought for Parents: आज रात बच्चे को सुलाने से पहले बस इतना पूछिए — “अगर तुम्हारा कोई भाई-दोस्त गलत काम करे, तो क्या तुम उसे सच बताने की हिम्मत रखोगे, जैसे विभीषण ने रखी?”
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
1. युद्ध कांड क्या है और इसे लंका कांड क्यों कहते हैं?
युद्ध कांड वाल्मीकि रामायण का छठा और सबसे बड़ा अध्याय है (128 सर्ग, 5,692 श्लोक), जिसमें लंका में श्रीराम और रावण की सेना के बीच पूरा युद्ध वर्णित है। चूँकि यह युद्ध लंका में हुआ, इसलिए इसे लंका कांड भी कहा जाता है (वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड)।
2. रावण का वध किसने किया था?
रावण का वध भगवान श्रीराम ने अपने बाणों और अंत में ब्रह्मास्त्र से किया था। पूरे युद्ध में हनुमान, लक्ष्मण, सुग्रीव और विभीषण ने भी रावण की सेना के खिलाफ बड़ी भूमिका निभाई (वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड)।
3. रावण का वध कब हुआ था?
रावण का वध आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को हुआ था। यही दिन आज पूरे भारत में विजयादशमी यानी दशहरा के रूप में मनाया जाता है (धार्मिक परंपरा)।
4. राम-रावण युद्ध कितने दिनों तक चला था?
अलग-अलग मान्यताओं के अनुसार लगातार भीषण युद्ध लगभग 8 दिनों तक चला, जबकि समुद्र-तट पर रुकने के समय सहित पूरा युद्ध-काल कुछ मान्यताओं में 84 दिनों तक भी बताया गया है (लोक-मान्यता)।
5. क्या रावण के सच में 1000 सिर थे?
नहीं। वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस, दोनों में रावण को परंपरागत रूप से दस सिर वाला (दशानन) ही बताया गया है, हज़ार सिर वाला नहीं। “1000 सिर वाले रावण” की बात मुख्यधारा की रामायण-परंपरा का हिस्सा नहीं है, इसलिए इसे तथ्य मानकर आगे न बढ़ाएं।
6. कुंभकर्ण और मेघनाद (इंद्रजीत) का वध किसने किया था?
कुंभकर्ण का वध स्वयं श्रीराम ने किया, जबकि मेघनाद (इंद्रजीत) का वध लक्ष्मण ने किया — वह भी तब जब मेघनाद निकुम्भिला मंदिर में एक गुप्त यज्ञ कर रहा था (वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड)।
7. गूगल, राम-रावण युद्ध की सबसे मशहूर चौपाई कौन सी है?
सबसे प्रचलित चौपाई है — “उत रावन इत राम दोहाई। जयति जयति जय परी लराई॥” (श्रीरामचरितमानस, लंकाकांड)।
8. युद्ध कांड के बाद श्रीराम अयोध्या कैसे पहुँचे?
रावण वध और सीता माता की अग्नि-परीक्षा के बाद श्रीराम, सीता और लक्ष्मण पुष्पक विमान पर बैठकर अयोध्या लौटे, जहाँ श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ — इस पूरी वापसी-यात्रा की कहानी हम अगली पोस्ट में विस्तार से सुनाएंगे।
ज़रूरी शब्द जानिए
- युद्धकांड (Yuddha Kand) — Battle Chapter | वाल्मीकि रामायण का छठा अध्याय, जिसमें लंका के युद्ध का वर्णन है
- ब्रह्मास्त्र (Brahmastra) — Divine Weapon | ब्रह्मा जी का दिया हुआ, उस समय का सबसे शक्तिशाली अस्त्र
- नागपाश (Nagpash) — Serpent-Bond | साँपों से बना हुआ बंधन-अस्त्र, जिससे शत्रु को जकड़ लिया जाता है
- सेतुबंधन (Setubandhan) — Bridge-Building | समुद्र पर पत्थरों का पुल बनाना
- विशल्या (Vishalya) — Healing Herb | घाव भरने वाली हिमालय की दिव्य औषधि
डैडी की बात
बच्चों, जब भी हम रावण के दस सिरों की बात सुनते हैं, असल में वो दस सिर उसके दस बड़े-बड़े अवगुणों की निशानी हैं — घमंड, गुस्सा, लालच जैसे। अगली बार जब कोई काम गुस्से या घमंड में करने का मन करे, याद रखना — रावण जैसा विद्वान भी इन्हीं की वजह से हार गया था।
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- अगर आपको युद्ध और वीरता वाली कहानियाँ पसंद हैं → कालनेमी वध और खर-दूषण वध ज़रूर पढ़ें
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