कृष्ण जन्माष्टमी 2026 कब है?

| विषय | विवरण |
|---|---|
| कहानी | कान्हा की बाल लीलाएं — माखनचोरी से तृणावर्त वध तक |
| स्थान | गोकुल और वृन्दावन, यमुना नदी तट |
| मुख्य पात्र | बाल कृष्ण, यशोदा मैया, नंद बाबा, बलराम |
| उम्र-समूह | 4-9 साल के बच्चों के लिए विशेष रूप से उपयुक्त |
| स्रोत | श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध |
| कृष्ण जन्माष्टमी 2026 | 4 सितंबर 2026, शुक्रवार |
| पढ़ने का समय | 30 मिनट |
| मुख्य सीख | ऐश्वर्य कितना भी बड़ा हो, प्रेम के आगे झुकना ही सबसे बड़ी महिमा है |
इस कहानी की 3 खास बातें:
- *क्या आप जानते हैं कि यशोदा मैया ने अपने ही नन्हे लाल के मुंह में पूरा ब्रह्मांड — तारे, पहाड़, समुद्र — सब कुछ देख लिया था?
- *कान्हा को रस्सी से बांधना नामुमकिन क्यों था — हर बार रस्सी ठीक दो अंगुल छोटी क्यों पड़ जाती थी?
- *नंद बाबा और यशोदा मैया पिछले जन्म में कौन थे — यह राज बहुत कम लोगों को पता है ।
कृष्ण जन्माष्टमी 2026 कब है?
कृष्ण जन्माष्टमी 2026 में 4 सितंबर, शुक्रवार को है — भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का यह पर्व हर साल भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी को आता है। आज हम आपके लिए लेकर आए हैं कान्हा की सबसे प्यारी, सबसे नटखट बाल लीलाओं की कहानी — वही कहानियां जिन्हें सुनकर बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी झूम उठते हैं। तो चलिए, चलते हैं गोकुल की उन गलियों में, जहां एक छोटा-सा बालक अपनी शरारतों से पूरी दुनिया को अपनी मुट्ठी में समेट लेता था।
कृष्ण जन्माष्टमी 2026 आरंभ तिथि और मुहूर्त
- अष्टमी तिथि प्रारंभ: 4 सितंबर 2026, रात्रि लगभग 2:25 बजे
- अष्टमी तिथि समाप्त: 5 सितंबर 2026, रात्रि लगभग 12:13 बजे
- निशीथ पूजा मुहूर्त (जन्मोत्सव पूजा): 4 सितंबर 2026 की रात 11:57 बजे से 12:43 बजे तक
- व्रत पारण: 5 सितंबर 2026, सूर्योदय के बाद
कंस कौन था और कृष्ण को गोकुल क्यों जाना पड़ा?
मथुरा का राजा कंस बहुत ही अत्याचारी और पापी शासक था। उसके विनाश के लिए स्वयं भगवान विष्णु को धरती पर अवतार लेना पड़ा। जिस दिन कंस की बहन देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ, ठीक उसी समय आकाशवाणी हुई — “हे कंस! इसी देवकी का आठवां पुत्र तेरा काल होगा।”

यह सुनते ही कंस क्रोध में देवकी को वहीं मार डालने दौड़ा पर वसुदेवजी ने वचन दिया कि हर संतान जन्म लेते ही वे स्वयं कंस को सौंप देंगे। इस वचन पर भरोसा करके भी कंस ने देवकी और वसुदेव दोनों को उसी दिन कारागार में बंदी बना लिया (श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध)।
एक-एक करके देवकी के सात पुत्र जन्मे, और निर्दयी कंस ने हर एक को जन्मते ही मार डाला पर जब आठवीं संतान का समय आया, तो कुछ बिल्कुल अलग हुआ। उस रात अचानक भयंकर तूफान उठा, आकाश में बिजलियां कड़कने लगीं और कारागार के सभी सुरक्षा प्रहरी गहरी नींद में डूब गए — जैसे कोई अदृश्य शक्ति सबको सुला रही हो।
ठीक उसी पल जब बालक का जन्म हुआ, वसुदेवजी को आकाशवाणी से आदेश मिला — वे इस बालक को तुरंत गोकुल में नंद बाबा के घर छोड़ आएं, वसुदेवजी ने बिना पल गंवाए बालक को एक टोकरी में रखा। जैसे ही वे कारागार के द्वार तक पहुंचे, सारे भारी-भरकम ताले और दरवाज़े अपने आप खुल गए — मानो खुद द्वार भी अपने भगवान के आगे झुक गए हों।

निशीथे तमउद्भूते जायमाने जनार्दने।
देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णुः सर्वगुहाशयः।
आविरासीद् यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः॥
(श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध, अध्याय 3, श्लोक 8)
घने अंधकार से भरी उस आधी रात में, जब भगवान जनार्दन प्रकट होने को थे, तब सबके हृदय में निवास करने वाले भगवान विष्णु देवरूपिणी देवकी माता से ठीक वैसे ही प्रकट हुए, जैसे पूर्व दिशा में पूर्णिमा का चांद अपने पूरे तेज के साथ उदय होता है।
वसुदेवजी अपने नन्हे बालक को लेकर उफनती यमुना नदी पार करने निकल पड़े — जिन्हें हम प्यार से “कान्हा” कहते हैं।
यमुना का जल इतना बढ़ा हुआ था कि लहरें टोकरी तक छूने लगीं, पर वसुदेवजी बिना डरे आगे बढ़ते गए। नदी पार करके वे गोकुल में नंद बाबा के घर पहुंचे, वहां चुपचाप बालक को छोड़ा, ठीक वैसे ही, जैसा आकाशवाणी में कहा गया था।
वहां माता यशोदा ने इस दिव्य बालक को अपने ही बेटे की तरह पाला-पोसा, बिना यह जाने कि उनकी गोद में स्वयं भगवान खेल रहे हैं। यहीं से शुरू हुई वह अद्भुत बाल-लीलाओं की श्रृंखला, जो आज भी हर घर में बड़े प्रेम से सुनाई जाती है — और जिसे सुनकर हर बच्चा खुद को कान्हा के करीब महसूस करता है।
कृष्ण ने बचपन में कौन-कौन सी बाल लीलाएं कीं?
गोकुल में बलराम और अपने साथी ग्वालबालों के साथ कान्हा दिन भर तरह-तरह के खेल खेलते थे। हर लीला में एक गहरा रहस्य छुपा था ।
पूतना वध — गोकुल में आई पहली राक्षसी
कान्हा अभी कुछ ही दिन के थे, तभी कंस ने अपनी पहली राक्षसी पूतना को गोकुल भेजा। पूतना बच्चों की जान लेने वाली एक भयंकर राक्षसी थी, पर उसने एक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धरा और चुपचाप यशोदा मैया के घर में प्रवेश कर लिया। किसी को शक न हो, इसलिए उसने अपने स्तन पर घातक विष लगा रखा था, और सोते हुए कान्हा को गोद में उठाकर दूध पिलाने लगी।

सुंदरी के भेष में आई मृत्यु
पर कान्हा तो स्वयं भगवान थे — उन्होंने विष के साथ-साथ पूतना का प्राण भी खींच लिया। एक भयंकर चीख के साथ पूतना अपने असली, विशालकाय राक्षसी रूप में गिर पड़ी (श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध, अध्याय 6)। सबसे अनोखी बात यह रही — जब गोपों ने उसके विशाल शरीर को जलाया, तो उसमें से बदबू नहीं, बल्कि सुगंधित धुआं उठा। भगवान का स्पर्श जब एक राक्षसी को भी शुद्ध कर देता है, फिर सच्चे भक्त की तो बात ही क्या।
माखनचोरी लीला — कान्हा माखन क्यों चुराते थे?
कान्हा को माखन बहुत प्रिय था, पर सिर्फ खुद खाने के लिए नहीं, वे चोरी करके अपने साथ घूमने वाले ग्वाल-सखाओं को भी खिलाते थे, और जो बचता उसे ज़मीन पर बिखेर देते ताकि आस-पास के बंदर भी खा सकें (श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध, अध्याय 9)।

गोपियां रोज़ यशोदा मैया के पास शिकायत लेकर आतीं “अरी यशोदा! तेरा यह कान्हा बड़ा नटखट हो गया है, दही-दूध चुराकर अपने सखाओं में बांट देता है, और वानरों तक को खिला देता है!” पर जब गोपियां कान्हा का डरा-सहमा मुखड़ा देखतीं तो उनकी शिकायत हंसी में बदल जाती। यशोदा मैया भी अपने लाल की इस चोरी पर डांटने से ज़्यादा मुस्कुराती रहतीं।
माटी-भक्षण लीला — यशोदा मैया ने मुख में क्या देखा?
एक दिन बलराम और सखाओं ने यशोदा मैया से शिकायत की “मैया! कन्हैया ने मिट्टी खाई है!” यशोदा मैया ने डांटते हुए कान्हा से मुंह खोलने को कहा। जैसे ही कान्हा ने मुंह खोला, यशोदा मैया ने उसमें पूरा ब्रह्मांड देखा — आकाश, दिशाएं, पहाड़, द्वीप, समुद्र, तारे, यहां तक कि खुद अपना और पूरे व्रज का प्रतिबिंब भी (श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध, अध्याय 8)। यह देखकर मैया घबरा गईं, पर भगवान की योगमाया ने तुरंत उनके हृदय में फिर से मातृ-स्नेह भर दिया, और वे सब कुछ भूलकर अपने लाल को गोद में उठा बैठीं।
उखल-बंधन लीला — कान्हा को बांधना नामुमकिन क्यों था?

एक बार यशोदा मैया दही मथ रही थीं, तभी कान्हा दूध पीने आ गए। दूसरी ओर चूल्हे पर दूध उफनने लगा, मैया कान्हा को अधपेटा छोड़कर दूध उतारने चली गईं। इससे नाराज़ होकर कान्हा ने दही का मटका फोड़ दिया और ओखली पर चढ़कर बंदरों को माखन खिलाने लगे।
जब मैया छड़ी लेकर पकड़ने दौड़ीं, तो कान्हा डरकर भाग खड़े हुए — पर आखिर पकड़े गए। मैया ने रस्सी से बांधना चाहा तो हर रस्सी ठीक दो अंगुल छोटी पड़ जाती। पूरे घर की रस्सियां जोड़ दीं, फिर भी कान्हा न बंधे (श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध, अध्याय 9)।
आखिर में, जब कान्हा ने देखा कि मैया पसीने से लथपथ, थककर बेहाल हो गई हैं, तो प्रेम-वश स्वयं ही बंध गए — वही भगवान, जिन्हें ब्रह्मा और इंद्र तक नहीं बांध सकते, एक मां के प्रेम के आगे झुक गए।
यमलार्जुन उद्धार — ओखल में बंधे कृष्ण ने क्या किया?
ओखल में बंधे-बंधे कान्हा घिसटते हुए आंगन में लगे दो बड़े अर्जुन वृक्षों (यमलार्जुन) के बीच जा पहुंचे। ये वृक्ष असल में कुबेर के दो पुत्र थे — नलकूबर और मणिग्रीव — जिन्हें नारदजी के श्राप के कारण वृक्ष बनना पड़ा था क्योंकि अपार धन-वैभव पाकर वे अहंकारी हो गए थे।

कान्हा के ओखल में घिसटते ही दोनों वृक्ष धड़ाम से गिरे, और उनमें से दिव्य रूप में नलकूबर-मणिग्रीव प्रकट होकर भगवान को प्रणाम करने लगे — इस तरह एक छोटे-से बालक ने बड़े-बड़े देवताओं को भी श्राप-मुक्ति दिला दी।
तृणावर्त वध — गोकुल पर आया बवंडर राक्षस
मथुरा के राजा कंस को जब पता चला कि उसका काल गोकुल में पल रहा है, तो उसने एक के बाद एक राक्षस भेजने शुरू किए। तृणावर्त नाम का एक असुर बवंडर का रूप धरकर गोकुल आया और नन्हे कान्हा को उड़ा ले गया।

पूरा गोकुल धूल के गुबार में खो गया, यशोदा मैया और गोपियां घबराकर इधर-उधर अपने कान्हा को ढूंढने लगीं। पर कान्हा ने अपना वज़न इतना भारी कर लिया कि तृणावर्त उन्हें गिरा नहीं सका और अंत में दैत्य निष्प्राण होकर धरती पर आ गिरा — कान्हा सकुशल वापस अपनी मां की गोद में आ गए। जब बवंडर छंटा और धूल शांत हुई, तो सब चकित रह गए कि इतना छोटा बालक कैसे बच निकला? किसी को नहीं पता था कि यह भगवान की ही लीला है।
बकासुर वध — गले में निगला कान्हा को
तृणावर्त की असफलता के बाद कंस ने और भी राक्षस भेजे। इनमें से एक था बकासुर — जो एक विशाल बगुले का रूप धरकर गोकुल आया और खेलते हुए कान्हा को अचानक निगल गया। कान्हा के गले में जाते ही उनका तेज इतना बढ़ गया कि बकासुर की चोंच जलने लगी और उसे तुरंत कान्हा को उगलना पड़ा।

गुस्से में बकासुर ने अपनी तेज चोंच से कान्हा पर वार करने की कोशिश की, पर कान्हा ने उसकी चोंच पकड़कर उसे चीर डाला। यह देखकर बलराम और सभी ग्वालबाल कान्हा की वीरता पर प्रसन्न हो उठे, और गोपियों ने घर लौटकर इस अद्भुत घटना को बड़े उत्साह से सुनाया।
कंस ने बाल कृष्ण को मारने के लिए क्या-क्या किया?
तृणावर्त और बकासुर तो सिर्फ शुरुआत थे — कंस लगातार राक्षस भेजता रहा, पर कान्हा हर बार बच निकलते। आखिर बड़े होने पर कंस ने धनुष-यज्ञ के बहाने कान्हा और बलराम को मथुरा बुलाया। मथुरा के द्वार पर छोड़े गए मतवाले हाथी कुवलयापीड़ को कान्हा ने वहीं मार गिराया।

अखाड़े में मामा कंस के बलशाली पहलवान चाणूर और मुष्टिक को भी पल भर में परास्त कर दिया। क्रोधित कंस जब कृष्ण को बंदी बनाने का आदेश देने लगा, तो कृष्ण स्वयं उछलकर उसके ऊंचे मंच पर जा पहुंचे। कंस के बालों से पकड़कर उसे रंगभूमि में पटका और एक प्रहार में कंस का अंत हो गया (श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध)। इसके बाद कृष्ण ने देवकी-वसुदेव को कारागार से मुक्त कराया, और कंस के पिता उग्रसेन को फिर से मथुरा का राजा बनाया।
सीख
बाल कृष्ण की ये लीलाएं सिर्फ शरारतें नहीं थीं। जो भगवान पूरे ब्रह्मांड को अपने भीतर समेटे हुए हैं, वही एक मां के हाथों बंधने में खुद को धन्य मानते हैं। यह दिखाता है कि सच्चा प्रेम किसी भी ऐश्वर्य से बड़ा होता है, और सबसे शक्तिशाली भी विनम्रता में ही सबसे सुंदर लगता है।
नंद बाबा और यशोदा मैया पूर्वजन्म में कौन थे?
राजा परीक्षित ने एक बार शुकदेवजी से पूछा था — नंद बाबा ने ऐसा कौन-सा पुण्य कर्म किया था कि खुद भगवान ने उनके घर जन्म लिया, जबकि देवकी-वसुदेव — जो कान्हा के असली माता-पिता थे — यह सुख नहीं पा सके? यह सवाल बहुत गहरा है, क्योंकि आमतौर पर हम मान लेते हैं कि जन्म देने वाले माता-पिता को ही सबसे ज़्यादा सुख मिलना चाहिए, पर यहां कहानी कुछ और ही कहती है।
शुकदेवजी ने बताया कि नंद बाबा पिछले जन्म में एक वसु थे, जिनका नाम द्रोण था, और उनकी पत्नी का नाम धरा था। दोनों ने ब्रह्माजी से यह वरदान मांगा था कि जब वे पृथ्वी पर जन्म लें, तो उन्हें भगवान के प्रति अनन्य प्रेम-भक्ति प्राप्त हो, जिसके सहारे संसार के लोग आसानी से जीवन की कठिनाइयों को पार कर सकें।
ब्रह्माजी ने “तथास्तु” कहकर यह वरदान दे दिया। उसी द्रोण ने नंद के रूप में और धरा ने यशोदा के रूप में जन्म लिया (श्रीमद्भागवत महापुराण, दशम स्कन्ध)। यही कारण है कि गोप-गोपियों में सबसे ज़्यादा प्रेम नंद-यशोदा को ही मिला, और भगवान ने स्वयं इस जन्म में उन्हीं के घर पलकर उनकी तपस्या को सफल बनाया।
Q1.कृष्ण जन्माष्टमी 2026 कब है?
कृष्ण जन्माष्टमी 2026 में 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी। निशीथ पूजा मुहूर्त उसी रात 11:57 बजे से 12:43 बजे तक रहेगा, और अगले दिन 5 सितंबर को दही-हांडी का उत्सव मनाया जाएगा।
Q2.कान्हा जी ने बाल लीला कब और कैसे की?
कान्हा जी ने अपनी बाल लीलाएं जन्म के तुरंत बाद द्वापर युग में गोकुल और वृन्दावन में कीं। उन्होंने माता यशोदा, नंद बाबा और ब्रजवासियों के प्रेम को स्वीकार करते हुए अपने बाल रूप में नटखट तरीके से यह लीलाएं रचीं।
Q3.कृष्ण की बाल लीला की कहानी क्या है?
कृष्ण की बाल लीला की कहानी में माखनचोरी, माटी-भक्षण, उखल-बंधन, यमलार्जुन उद्धार और तृणावर्त वध जैसी घटनाएं शामिल हैं, जो श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध में वर्णित हैं।
Q4.यमलार्जुन कौन थे और कृष्ण ने उन्हें कैसे मुक्ति दी?
यमलार्जुन असल में दो अर्जुन के पेड़ का जोड़े का नाम था,जो कान्हा के आँगन में था जो कुबेर के दो पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव थे, जो नारदजी के श्राप से वृक्ष बन गए थे। कान्हा ने ओखल में बंधे-बंधे उन वृक्षों को गिराकर उन्हें श्राप से मुक्ति दिलाई।
Q5.मैया यशोदा ने कान्हा के मुख में क्या देखा था?
मैया यशोदा ने कान्हा के मुख में संपूर्ण ब्रह्मांड देखा — आकाश, तारे, पहाड़, द्वीप और समुद्र, यहां तक कि खुद अपना प्रतिबिंब भी। यह घटना माटी-भक्षण लीला के दौरान हुई थी।
Q6.नन्द बाबा और यशोदा मैया पूर्वजन्म में कौन थे?
नन्द बाबा पूर्वजन्म में वसु द्रोण थे और यशोदा मैया उनकी पत्नी धरा थीं। दोनों ने ब्रह्माजी से भगवान के प्रति अनन्य प्रेम-भक्ति का वरदान मांगा था, जो इसी जन्म में पूरा हुआ।
Q7.कृष्ण जी बचपन में माखन क्यों चुराते थे?
कृष्ण जी बचपन में माखन इसलिए चुराते थे ताकि वे उसे अपने ग्वाल-सखाओं और साथियों को बांट सकें, सिर्फ अपने लिए नहीं। यह उनके प्रेम और उदारता का प्रतीक माना जाता है।
Daddy की बात
अगली बार जब आप शरारत करें और पकड़े जाएं, तो याद रखिएगा — कान्हा भी पकड़े गए थे, पर उन्होंने कभी झूठ बोलना नहीं सीखा। और मम्मी-पापा भी, कान्हा की मां यशोदा की तरह, गुस्सा दिखाकर भी हमेशा प्यार से ही भरे रहते हैं।
और आप, पेरेंट्स — अगली बार जब कोई शरारत आपका धैर्य तोड़े, यशोदा मैया को याद कीजिएगा: छड़ी हाथ में लेकर भी, प्यार पहले आता है, डांट बाद में।