सुंदरकांड की कहानी

22 सितंबर 2026
Quick Facts Table
| कहानी | स्थान | मुख्य पात्र | स्रोत | पढ़ने का समय | मुख्य सीख |
|---|---|---|---|---|---|
| सुंदरकांड (हनुमान जी की लंका यात्रा) | पौराणिक लंका (परंपरागत रूप से वर्तमान श्रीलंका क्षेत्र से जोड़ा जाता है) | हनुमान, सीता माता, रावण, विभीषण, जाम्बवंत | वाल्मीकि रामायण एवं गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस | ~37 मिनट | सच्ची भक्ति और साहस से असंभव भी संभव हो जाता है |
तीन बातें जो इस कहानी को खास बनाती हैं:
- 😲 हनुमान जी अकेले, बिना किसी सेना या नाव के, पूरे समुद्र को पार कर गए — आख़िर कैसे? जवाब जानकर आप हैरान रह जाएंगे।
- 🤔माता सीता ने हनुमान जी को अपनी कौन सी अनमोल निशानी दी, जिसे देखकर श्रीराम की आंखों में आंसू आ गए?
- ✨ “सुंदरकांड में 68 अध्याय हैं” और “सुंदरकांड में 526 चौपाइयां हैं” — ये दोनों बातें सही हैं, पर दो अलग-अलग ग्रंथों की, नीचे पढ़िए क्यों।
सुंदरकांड की कहानी रामायण के पांचवें सोपान की वह गाथा है, जिसमें पवनपुत्र हनुमान अकेले विशाल समुद्र को पार कर लंका पहुंचते हैं, माता सीता को खोज निकालते हैं और लौटते समय लंका को जलाकर रावण को अपनी ताकत की पहली झलक दिखा देते हैं ।
समुद्र का किनारा — सुंदरकांड की कहानी क्यों शुरू हुई?
समुद्र किनारे श्रीराम की वानर-सेना रुकी खड़ी थी — माता सीता लंका में बंदी थीं और सामने फैला था वह विशाल समुद्र जिसे कोई भी पार करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था।

तभी रीछराज जाम्बवंत ने हनुमान जी को उनकी भूली हुई शक्ति याद दिलाई — कि बचपन के एक श्राप ने उन्हें अपनी ही ताकत भुला दिया है । भुला हुआ बल याद आते ही हनुमान जी का शरीर पर्वत जितना विशाल हो गया और उन्होंने महेंद्र पर्वत से लंका की और श्रीराम का नाम लेकर छलांग लगा दी — और उसी पल से शुरू हो गया सुंदरकांड।
चौपाई (गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस, सुंदरकांड):
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
अर्थ: जाम्बवंत के सुंदर वचन सुनकर हनुमान जी के हृदय को वे बहुत भाए (अर्थात उनकी भूली हुई ताकत का स्मरण उन्हें बहुत अच्छा लगा)।

हनुमान जी का सागर-लंघन — समुद्र कैसे पार किया?
आकाश मार्ग में अचानक नीचे से एक आवाज़ आई — “रुको, हनुमान! थोड़ी देर मुझ पर बैठकर सुस्ता लो।” यह समुद्र था, जिसने अपने भीतर छिपे मैनाक पर्वत से कहा था कि वह हनुमान जी को विश्राम दे। पर हनुमान जी ने उड़ान रोके बिना ही विनम्रता से इनकार कर दिया — “राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम,” यानी श्रीराम का काम पूरा किए बिना मुझे विश्राम कैसा (गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस, सुंदरकांड)। इतना कहकर वे आगे बढ़ गए।

तभी आसमान में से एक विशाल आकृति उनके सामने आ खड़ी हुई — यह थीं सुरसा, नागों की माता, जिन्हें देवताओं ने हनुमान जी की परीक्षा लेने भेजा था। सुरसा गरजी — ” इस समुद्र से जो गुजरता है उसे एक बार मेरे मुख में से होकर जाना पड़ता है अन्यथा तुम मेरा भोजन बनोगे!” और अपना मुंह इतना बड़ा फैलाया कि आसमान का एक कोना ढक गया। हनुमान जी ने भी तुरंत अपना शरीर उतना ही बड़ा कर लिया। सुरसा का मुंह और बड़ा हुआ — हनुमान जी और बड़े हो गए!
लेकिन यह क्या ! पलक झपकते ही अपना शरीर अंगूठे जितना छोटा कर लिया, फुर्ती से सुरसा के विशाल मुंह में घुसे और उतनी ही फुर्ती से बाहर निकल आए! फिर सिर झुकाकर बोले — “माता, आज्ञा दीजिए।” सुरसा हंस पड़ीं और खुश होकर उन्हें आशीर्वाद दे दिया।
(आप बताइए — अगर आप हनुमान जी की जगह होते, तो सुरसा के सामने क्या तरकीब अपनाते?)
राक्षसी सिंहिका वध
रास्ता अभी खत्म नहीं हुआ था। नीचे समुद्र की सतह पर एक और खतरा घात लगाए बैठा था — राक्षसी सिंहिका, जो पानी में उड़ने वालों की परछाईं पकड़कर उन्हें नीचे खींच लेती और निगल जाती थी। जैसे ही उसने हनुमान जी की परछाईं पकड़ी, हनुमान जी का शरीर हवा में जैसे किसी अदृश्य डोर से बंध गया, और वे नीचे की ओर खिंचने लगे। हनुमान जी तुरंत समझ गए कि यह कोई साधारण शक्ति नहीं। उन्होंने नीचे देखा — सिंहिका मुंह खोले उन्हें निगलने को तैयार बैठी थी। पर हनुमान जी ने भी घबराने की बजाय पलटवार किया ।

उन्होंने अपना शरीर बिजली की तरह छोटा किया, सीधे उसके खुले मुंह में समा गए और भीतर पहुंचते ही अपना शरीर तेज़ी से बड़ा कर उसके शरीर को भीतर से फाड़ते हुए बाहर निकल आए! एक पल में सिंहिका का काम तमाम हो गया, और हनुमान जी बिना रुके आगे बढ़ चले।
आखिरकार, दूर क्षितिज पर सोने की तरह चमकती एक नगरी दिखाई दी — लंका! हनुमान जी की आंखों में पहली बार वह नगरी उतरी, जहां माता सीता कहीं बंदी थीं।
अशोक वाटिका में भेंट — हनुमान जी को माता सीता कैसे मिलीं?
रात गहरी हो चली थी जब हनुमान जी ने अपना रूप बदला — इतना छोटा कि मच्छर जैसा! इसी रूप में वे चुपके से लंका के फाटक तक पहुंचे। वहां पहरा दे रही थी एक डरावनी राक्षसी — लंकिनी। उसने गरजते हुए हनुमान जी को रोकने की कोशिश की पर हनुमान जी ने बस एक ही मुक्का जड़ा, और लंकिनी धड़ाम से ज़मीन पर जा गिरी। गिरते-गिरते वह समझ गई — “यह कोई साधारण वानर नहीं, राक्षसों के अंत की घड़ी आ पहुंची है।”
सीधे हनुमान जी उस भव्य महल की ओर बढ़े जहां रावण रहता था। छोटे से रूप में इधर-उधर घूमते हुए वे हर कमरे में पहुंचे,पर माता सीता वहां कहीं नहीं मिलीं। निराश होकर वे पूरे नगर में गली-दर-गली ढूंढने लगे।
ढूंढते-ढूंढते हनुमान जी को एक अनोखा घर दिखा — चारों तरफ राक्षसों के भव्य महलों के बीच, यह घर बिल्कुल अलग था, जिसके द्वार पर तुलसी का पौधा और भगवान विष्णु की पूजा के चिह्न थे। यह घर था विभीषण का, रावण के छोटे भाई का। हनुमान जी ब्राह्मण का रूप धरकर उनसे मिले, और विभीषण ने बड़े प्रेम और सत्कार से उनका स्वागत किया, अपना परिचय दिया, और तुरंत बता दिया कि माता सीता कहां बंदी हैं — अशोक वाटिका में। जाते-जाते विभीषण ने यह भी कहा, “मेरा मन जानता है, धर्म की जीत श्रीराम के साथ ही होगी।”

आख़िरकार हनुमान जी अशोक वाटिका पहुंचे। और वहां, एक पेड़ के नीचे, ज़मीन पर बैठी मिलीं माता सीता — उदास, दुबली, चारों ओर राक्षसियां पहरा दे रही थीं। पर उनके होंठ हिल रहे थे — धीरे-धीरे, बार-बार, सिर्फ एक ही नाम बुदबुदा रहे थे — “राम… राम…”
हनुमान जी का मन भर आया। वे चुपचाप पेड़ की एक ऊंची डाल पर जा बैठे और सीता जी के अकेले होने का इंतज़ार करने लगे। तभी वहां रावण आ पहुंचा। उसने माता सीता को शादी का प्रस्ताव दिया, धमकाया, मनाया, डराया — पर माता सीता ने उसका प्रस्ताव अस्वीकार कर कहा की वह अपने पापों का प्राश्चित कर ले और अधर्म त्याग दे अन्यथा उसकी मृत्यु निश्चित है । उपदेश सुन रावण उन्हें जान से मारने की धमकी देता हुआ वहां से निकल गया ।

रावण के जाते ही, हनुमान जी ने ऊपर से धीरे से कुछ नीचे गिराया — श्रीराम की मुद्रिका! माता सीता ने उसे उठाया, वे उसे तुरंत पहचान गई । उनकी आंखों में अविश्वास था — “यहां, इस राक्षस-नगरी में, श्रीराम का की मुद्रिका उसे कैसे मिल सकता है?”
तभी हनुमान जी धीरे से पेड़ से नीचे उतरे और सामने आ खड़े हुए। “माता, मैं श्रीराम का दूत हूं,” उन्होंने कहा, और फिर शुरू से अंत तक पूरी कहानी सुना डाली। सुनते-सुनते माता सीता कुछ पल के लिए अपना सारा दुख भूल गईं। उन्होंने हनुमान जी से श्री राम का हाल जाना । उत्सुकता से पूछा कि वे उन्हें कब लेने आ रहे हैं?
हनुमान जी ने बताया कि श्री राम के सभी प्रयासों की जानकारी दी और बताया कि जब वे जान जाएंगे कि सीता जी यहां लंका में है तो पल भर की देर यहां पहुंचने में नहीं लगाएंगे ।
हनुमान जी की बात सुनकर सीता जी का मन आशा से भर गया मगर फिर उन्हें एक नई शंका हुई कि इतने छोटे शरीर वाले वानर, रावण की विशाल और भयंकर राक्षस सेना का सामना कैसे करेंगे। उनकी इस शंका को दूर करने के लिए हनुमान जी ने अपना पर्वत के समान विशाल, स्वर्ण के समान चमकता हुआ अत्यंत बलशाली रूप (विराट रूप) प्रकट किया। इसे देखकर सीता जी को वानर सेना की अजेय शक्ति पर पूर्ण विश्वास हो गया।
जाते समय उन्होंने अपने बालों से अपनी सबसे अनमोल निशानी उतारी — चूड़ामणि — और हनुमान जी को सौंप दी। “यह ले जाओ,” उन्होंने कहा, “ताकि श्रीराम जान लें कि उनका संदेश सच में मुझ तक पहुंचा है।”(यदि आप रामचरितमानस (जो कि सर्वाधिक प्रचलित है) का पाठ करते हैं तो चूड़ामणि बाद में दी गई थी, जबकि मूल वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह घटना लंका दहन से पहले की है।)
चौपाई (गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस, सुंदरकांड):
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥
अर्थ: हे माता! सुनो, वानरों में बहुत बल-बुद्धि नहीं होती, परंतु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है — यानी प्रभु की कृपा से निर्बल भी महान कार्य कर सकता है।
पूंछ में आग — हनुमान जी ने लंका क्यों जलाई?
अब लौटने से पहले हनुमान जी के मन में एक शरारती विचार आया — “क्यों न जाते-जाते रावण को उसकी ताकत का एक नमूना दिखा ही दूं?” तो माता सीता का विश्वास जीतने के पश्चात हनुमान जी ने विनम्रतापूर्वक कहा कि वाटिका के सुंदर फलों को देखकर उन्हें तीव्र भूख लग आई है। उनकी यह बात सुनकर सीता जी ने वात्सल्य भाव से सचेत किया कि इस वन की रखवाली अत्यंत भयंकर और योद्धा राक्षस करते हैं।
इस चेतावनी के बावजूद वीर हनुमान जी तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने निर्भीकता से उत्तर दिया कि हे माता, यदि आप प्रसन्न होकर मुझे आज्ञा दें, तो मुझे उन राक्षसों का बिल्कुल भी भय नहीं है।

इस प्रकार असीम बलशाली होते हुए भी हनुमान जी ने फल खाने से पूर्व माता से यह विधिवत अनुमति मांगी। पहले फल तोड़कर खाए फिर अशोक वाटिका को तहस-नहस कर डाला, पेड़ उखाड़े, । वाटिका के रक्षक उन्हें मारने आए तो उन्होंने उन्हें भी नहीं बख्शा । जब रावण के पुत्र अक्षय कुमार ने हनुमान जी को ललकारा तो हनुमान जी ने उसका रथ नष्ट कर उसका वध कर दिया।
यह सुनकर रावण आग-बबूला हो उठा। उसने अपने सबसे बड़े योद्धा-पुत्र मेघनाद को भेजा। मेघनाद ने ब्रह्मपाश चलाया — और हनुमान जी, जो चाहते तो उससे भी बच सकते थे, चुपचाप बंध गए। क्यों? क्योंकि ब्रह्मा के पाश का सम्मान रखना ज़रूरी है। यह कमज़ोरी नहीं थी — यह उनकी समझदारी थी।
बंधे हुए हनुमान जी को रावण की सभा में लाया गया। पूरा दरबार हंस रहा था, पर हनुमान जी की आंखों में ज़रा भी डर नहीं था। रावण के सामने खड़े होकर उन्होंने कहा — “सीता माता को सम्मान सहित लौटा दो, वरना तुम्हारा और तुम्हारी पूरी लंका का विनाश तय है,यह श्री राम का सन्देश है !”

रावण क्रोध से कांप उठा। उसने हनुमान जी को जान से मारने आदेश दिया । उसी समय विभीषण ने उन्हें ऐसा आदेश न देने की सलाह दी क्योंकि नीति कहती है कि दूत जो कि संदेश वाहक है उसे मारना धर्मयुक्त नहीं है । तब रावण बोला कि वानर को उसकी पूंछ बहुत प्यारी होती है अतः इसकी पूंछ में आग लगा दो!”
सैनिकों ने कपड़ा लपेटकर हनुमान जी की लंबी पूंछ में आग लगा दी। पर यह क्या उन्होंने जलती हुई पूंछ को ही अपना हथियार बना लिया — एक छलांग में इस महल से उस महल, और हर छलांग के साथ आग फैलती गई। देखते ही देखते पूरी सोने की लंका धू-धू करके जलने लगी! । आग बुझाकर, माता सीता से आखिरी बार मिलकर, हनुमान जी फिर एक बार समुद्र की ओर बढ़े ।

और एक ही छलांग में वापस उस पार पहुंच गए — जहां श्रीराम बेसब्री से उनका इंतज़ार कर रहे थे। चूड़ामणि सौंपते हुए हनुमान जी ने पूरा वृत्तांत सुनाया, और सुनते ही श्रीराम की आंखें भर आईं। यहां सुंदरकांड समाप्त और युद्ध कांड शुरू होगा ।
सुंदरकांड का सार — हमें क्या सीख मिलती है?
सुंदरकांड से शिक्षा मिलती है —
- राम काज सच्ची लगन से पूरा होता है।
- हनुमान जी का चरित्र असीम धैर्य और सेवा का मार्ग दिखाता है।
- राह की हर बाधा को समझ और चतुरता से पार किया जा सकता है।
- माता सीता का धीरज यह बताता है कि दुष्ट के आगे भी डटे रहना चाहिए।
- अथाह बल पाकर भी सदैव नम्र रहना हनुमान जी का महान गुण था।
- लक्ष्य तक जाते समय बीच राह के हर लालच को त्याग देना चाहिए।
- प्रभु राम का आसरा हर विपदा को हर लेता है।
नाम का रहस्य — सुंदरकांड नाम का मतलब क्या है?
“सुंदर” शहर से जुड़ा नाम: रावण की लंका को स्वयं ग्रंथों में एक अत्यंत सुंदर, सोने से जड़ी नगरी बताया गया है — इसी सुंदर नगरी में घटी कथा होने से इसका नाम सुंदरकांड पड़ा। हनुमान जी की सुंदर भक्ति: बिना किसी स्वार्थ के अकेले समुद्र पार करना, आग सहना, सेनाओं से भिड़ना — भक्ति की यह मिसाल इतनी सुंदर है कि इसी से भी नाम जुड़ता है। धर्म के सुंदर परिणाम का प्रतीक: जब सच्चे मन से सेवा की जाती है, तो परिणाम हमेशा सुंदर होता है — सुंदरकांड इसी बात का प्रमाण माना जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. सुंदरकांड को “सुंदर” नाम क्यों दिया गया?
इसका नाम रावण की सुंदर सोने की लंका नगरी, हनुमान जी की सुंदर
निःस्वार्थ भक्ति, और धर्म-पालन के सुंदर परिणाम — इन तीन पारंपरिक
कारणों से जोड़ा जाता है।
2. सुंदरकांड का मुख्य नायक कौन है — राम या हनुमान?
सुंदरकांड पूरी रामायण का एकमात्र ऐसा कांड है जो किसी स्थान या
घटना के नाम पर नहीं, बल्कि हनुमान जी के सुंदर चरित्र और वीरता पर
आधारित है — इसीलिए इसके नायक श्रीराम की बजाय हनुमान जी माने जाते
हैं ।
3. सुंदरकांड की मुख्य कथा और घटनाक्रम क्या है?
समुद्र लांघना → सुरसा और लंकिनी जैसी बाधाएं पार करना → विभीषण से
भेंट → अशोक वाटिका में सीता माता से भेंट व मुद्रिका सौंपना →
अक्षय कुमार वध व अशोक वाटिका विध्वंस → लंका दहन → समुद्र पार
वापसी और श्रीराम को चूड़ामणि सहित संदेश — यही क्रम है।
4. सुंदरकांड पढ़ने से क्या लाभ होता है?
मान्यता है कि इसका पाठ जीवन की बाधाओं को दूर करता है और मन में
सकारात्मकता व आत्मविश्वास लाता है।
5. सुंदरकांड में कुल कितने अध्याय हैं?
वाल्मीकि रामायण के अनुसार सुंदरकांड में 68 सर्ग (अध्याय) हैं । यह गिनती संस्कृत मूल ग्रंथ की है,
तुलसीदास जी की रामचरितमानस से अलग है, जिसकी गिनती नीचे दी गई है।
6. सुंदरकांड में कितने दोहे और चौपाइयां हैं?
गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड में 3 श्लोक,
60 दोहे और 526 चौपाइयां हैं । यही वह
संस्करण है जो अधिकतर घरों में पढ़ा जाता है।
7. सुंदरकांड की सबसे प्रसिद्ध चौपाई कौन सी है?
सबसे लोकप्रिय चौपाइयों में से एक है “प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥” — जिसका अर्थ है श्रीराम को हृदय में
रखकर हर काम करना। यह चौपाई अक्सर पाठ की शुरुआत में गाई जाती है।
8. सुंदरकांड पढ़ने से पहले क्या करना चाहिए?
पाठ शुरू करने से पहले स्नान करके साफ वस्त्र पहनने, हनुमान जी की
छवि के सामने घी का दीया जलाने और संक्षिप्त गणेश-वंदना करने की
परंपरा है। कोई सख़्त नियम नहीं है — सच्ची भक्ति ही सबसे ज़्यादा
मायने रखती है।
9. हनुमान जी ने सुंदरकांड में कौन-कौन से बड़े काम किए?
हनुमान जी ने समुद्र पार किया, सुरसा और सिंहिका जैसी बाधाओं को
हराया, माता सीता को खोजा, अक्षय कुमार का वध किया और लंका को
जलाया — यह सब एक ही रात और अगले दिन में हुआ।
10. सुंदरकांड के बाद रामायण की अगली कहानी कौन सी है?
सुंदरकांड के बाद रामायण का अगला भाग लंकाकांड है, जिसमें श्रीराम की सेना समुद्र पर पुल बनाकर लंका पहुंचती है और रावण के साथ युद्ध होता है — वह कहानी हम अगली पोस्ट में लाएंगे।
ज़रूरी शब्द जानिए
- किष्किन्धा काण्ड (kishkindha Kand) रामायण का चौथा भाग/सोपान
- सुंदरकांड (Sundarkand) — रामायण का पांचवां भाग/सोपान
- अशोक वाटिका (Ashok Vatika) — वह बगीचा जहां माता सीता को बंदी रखा गया था
- मुद्रिका (Mudrika) — अंगूठी, जो श्रीराम ने पहचान-चिन्ह के रूप में भेजी
- चूड़ामणि (Chudamani) — सिर के बीच या जूड़े में पहने जाने वाले रत्नजड़ित गहने को चूड़ामणि कहा जाता है। जो सीता माता ने वापसी में हनुमान जी को दिया
- सर्ग (Sarga) — संस्कृत ग्रंथों में एक अध्याय/भाग को कहते हैं
आगे क्या पढ़ें?
- अगर आपको हनुमान जी की और कहानियां पसंद हैं, तो हमारी बाकी रामायण कहानियां भी ज़रूर पढ़ें
- सोने से पहले बच्चे को सुनाने के लिए छोटी कहानी चाहिए तो हमारे “पंचतंत्र” सेक्शन पर जाएँ
एक Daddy की बात: बचपन में मेरी दादी मुझे भी ठीक ऐसे ही मंगलवार की शाम सुंदरकांड सुनाया करती थीं और आज जब मैं बच्चों को यही कहानी सुनाता हूं, सबसे ज़्यादा उत्साह उन्हें उस पल में आता है जब हनुमान जी सुरसा के मुंह में घुसकर बाहर निकल आते हैं — बच्चे हंसते हुए पूछते हैं “फिर वो इतना छोटा कैसे हो गया?” यही तो सुंदरकांड की खूबी है — डर के बीच भी एक मुस्कान छोड़ जाती है यह कहानी, पीढ़ी दर पीढ़ी।
लेखक: देवेंद्र व्यास


