रामायण की कहानियां

किष्किंधा कांड रामायण — सुग्रीव राज्याभिषेक से सीता खोज तक की पूरी कहानी

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किष्किंधा कांड रामायण
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बिंदुविवरण
कहानीकिष्किंधा कांड — राम-सुग्रीव मित्रता से लेकर सीता-खोज हेतु वानर-सेना प्रस्थान तक
स्थानऋष्यमूक पर्वत, किष्किंधा राज्य, पम्पा सरोवर क्षेत्र (वर्तमान कर्नाटक-आंध्र सीमा क्षेत्र माना जाता है)
मुख्य पात्रश्रीराम, लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव, बाली, तारा, अंगद, जाम्बवंत
स्रोतवाल्मीकि रामायण (किष्किंधा कांड — 67 सर्ग, 2,445 श्लोक) और गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस (चतुर्थ सोपान — 30-31 दोहे)
पढ़ने का समय25 मिनट
मुख्य सीखसच्ची मित्रता संकट में साथ खड़ी होने से बनती है, और धैर्य ही हर कठिन काम को आसान बना देता है
  • 😲किष्किंधा कांड की कहानी में सुग्रीव को अपने ही सगे भाई बाली से जान बचाकर 14 साल तक पहाड़ पर छुपकर रहना पड़ा — वजह थी एक गलतफ़हमी जो कभी सुलझी ही नहीं।
  • 🤔 अग्नि के सामने मित्रता की कसम खाने वाले सुग्रीव आख़िर राजा बनते ही सीता माता की खोज का वचन कैसे भूल गए?
  • ⚡ वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड में पूरे 67 सर्ग हैं, जबकि तुलसीदासजी ने वही पूरी कथा सिर्फ 30-31 दोहों में समेट दी — यही रामचरितमानस की असली ताक़त है।

Table of Contents

राम-हनुमान भेंट से बाली वध तक — संक्षेप में

राम सुग्रीव मित्रता अग्नि साक्षी किष्किंधा कांड
अग्नि को साक्षी मानकर राम और सुग्रीव के बीच हुई मित्रता

किष्किंधा कांड रामायण की शुरुआत ऋष्यमूक पर्वत से होती है, जहाँ राम और लक्ष्मण माता सीता को खोजते हुए वन में पहुँचे। इसी स्थान पर सुग्रीव भी अपने भाई बाली के भय से छिपे हुए थे। दो अजनबी वीरों को धनुष-बाण लिए देखकर सुग्रीव के मन में शंका हुई कि कहीं इन्हें बाली ने तो नहीं भेजा। सच्चाई जानने के लिए उन्होंने अपने मंत्री हनुमान को विप्र (ब्राह्मण) वेष में भेजा। हनुमान जी ने दोनों भाइयों का वास्तविक परिचय पाकर उनके चरणों में शीश नवाया और उन्हें सुग्रीव से मिलवाया। वहाँ अग्नि को साक्षी मानकर प्रभु श्री राम और सुग्रीव में अटूट मित्रता स्थापित हुई।

सुग्रीव ने अपने बताया कि एक गहरी गलतफ़हमी से उसका बड़ा भाई उसका दुश्मन बन गया है और उसने राज सिंहासन के साथ उसकी प्रिय पत्नी को भी उससे छीन लिया है । यदि बाली से उसका सामना हुआ भी तो उसका मरना तय है क्योंकि बाली को यह भवरदान है कि उसके सामने लड़ने वाले की आधी शक्ति उसी में समा जाती। भगवान राम ने सुग्रीव को दुष्ट बाली को दंड देने में उसकी सहायता देने का वचन दिया ।

बाली सुग्रीव युद्ध
श्री राम बाली और सुग्रीव में अंतर नहीं कर पाए

योजनानुसार सुग्रीव ने बाली को मल्ल-युद्ध के लिए ललकारा। पहले द्वंद्व में दोनों भाइयों का रूप-रंग एक जैसा होने के कारण श्री राम बाण नहीं चला सके और सुग्रीव मार खाकर पीछे हटे। इसके बाद श्री राम ने सुग्रीव के गले में गजपुष्पी की माला पहनाई, ताकि युद्ध के दौरान उनकी पहचान स्पष्ट रहे। दोबारा हुए भीषण युद्ध में श्री राम ने वृक्ष की ओट से बाली पर बाण चलाया,बाली घायल होकर गिर पड़ा ।

बाली वध श्रीराम बाण किष्किंधा कांड
श्रीराम द्वारा धर्म-रक्षा हेतु बाली पर बाण चलाने का निर्णायक क्षण

शरशय्या पर पड़े बाली ने प्रश्न किया कि एक मर्यादा पुरुषोत्तम ने छिपकर प्रहार क्यों किया? तब श्री राम ने मर्यादा और धर्म का बोध कराते हुए समझाया कि अनुज की भार्या पुत्री समान होती है, और उसका बलपूर्वक हरण करने वाला दंड का भागी होता है। बाली ने अपनी भूल स्वीकार की और मोक्ष प्राप्त करने से पूर्व अपने पुत्र अंगद का हाथ श्री राम और सुग्रीव को सौंप दिया।

सुग्रीव बने किष्किंधा के राजा

  • श्रीराम ने सुग्रीव को किष्किंधा का राजा घोषित किया
  • बाली के पुत्र अंगद को युवराज बनाया गया
  • लक्ष्मणजी ने पुरजनों और ब्राह्मणों को बुलाकर विधिवत राज्याभिषेक करवाया
  • श्रीराम ने वर्षा ऋतु बीतने तक पास के पर्वत पर ही रुकने का निर्णय लिया, ताकि सुग्रीव अपना राज्य संभाल सकें

वर्षा और शरद ऋतु में क्या हुआ?

राज्याभिषेक के बाद श्रीराम और लक्ष्मण प्रवर्षण पर्वत की एक फटिक (स्फटिक) शिला पर वर्षा ऋतु बिताने लगे। तुलसीदासजी ने यहाँ प्रकृति का बहुत सुंदर वर्णन किया है — घने बादलों की घोर गर्जना, बिजली की अस्थिर चमक, और मोरों का नाचना। श्रीराम इसी दौरान लक्ष्मण से कहते हैं, “लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पैखी” — देखो, बादल देखकर मोर कैसे नाच उठते हैं (रामचरितमानस, किष्किंधाकाण्ड)। पर उसी पल उनका मन सीता माता की याद से भी भर आता है — “घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।” — आकाश में घोर गर्जना करते बादलों को देखकर उनका मन प्रिया-वियोग के भय से काँप उठता है।

राजमहल में धनुषधारी लक्ष्मण वानर के सामने किष्किंधा कांड
राजसभा में लक्ष्मण और सुग्रीव के बीच तनावपूर्ण क्षण

फिर वर्षा बीतती है और शरद ऋतु आती है इसी निर्मल, सुंदर शरद ऋतु में एक चिंता की लकीर भी उभरती है कि अब तक सीता माता की कोई ख़बर नहीं मिली (रामचरितमानस) । आखिर लक्ष्मण जी का धैर्य जवाब दे गया उन्हें लगा कि राज सुख में डूबे सुग्रीव को अब अपना वचन याद नहीं रहा । लक्ष्मणजी क्रोधित होकर धनुष उठाए किष्किंधा जा पहुँचे। डर के मारे सुग्रीव को अपनी भूल का एहसास हुआ, लक्ष्मण सुग्रीव संवाद के बाद राजा सुग्रीव ने लक्ष्मण से देरी के लिए क्षमा मांगकर उन्होंने अपनी सेना को सीता माता को चारो दिशाओं में खोजने का आदेश दिया ।

सीता की खोज के लिए वानर सेना क्यों भेजी गई?

  • सुग्रीव ने साफ़ चेतावनी दी: “एक महीने के भीतर लौट आना; जो बिना ख़बर लिए, समय बीतने पर भी लौटा तो मैं उसे मार डालूँगा” (रामचरितमानस) — यह वही एक-महीने की समय-सीमा है जो आगे पूरी खोज को गति देती है
  • दक्षिण दिशा गई टोली में अंगद, हनुमान, जाम्बवंत और नल जैसे प्रमुख वानर शामिल थे

सम्पाती से भेंट और हनुमान को समुद्र लांघने की प्रेरणा कैसे मिली?

दक्षिण दिशा में गए अंगद, हनुमान और जाम्बवंत के दल को जब तय समय बीतने पर भी सफलता नहीं मिली, तो वे निराश होकर समुद्र तट पर प्रायोपवेशन (मृत्यु पर्यन्त अनशन) पर बैठ गए। वहीं उनकी भेंट जटायु के ज्येष्ठ भ्राता सम्पाती से हुई। अपने छोटे भाई जटायु का नाम और उसकी मृत्यु का समाचार सुनकर व्याकुल सम्पाती ने वानरों से पूरी कथा पूछी, जिस पर जाम्बवंत और अंगद ने उसे सीता हरण व जटायु की वीरगति का सारा वृत्तांत सुनाया।

सम्पाती की दिव्य दृष्टि सीता माता किष्किंधा कांड
सम्पाती ने अपनी दिव्य दृष्टि से सीता माता को अशोक वाटिका में सुरक्षित देखा

भाई के लिए विलाप करने के उपरांत सम्पाती ने श्री राम की सेवा के भाव से अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर बताया कि सीता माता सौ योजन दूर लंका के अशोक वाटिका में सुरक्षित हैं।

अब समुद्र पार कैसे हो और कौन करे ?

जाम्बवंत ने बताया कि युवावस्था में—जब भगवान वामन ने त्रिविक्रम रूप धरकर तीन पगों में तीनों लोकों को नापा था—तब उन्होंने अत्यंत अल्प समय में प्रभु की इक्कीस बार परिक्रमा कर ली थी। परंतु अब समय बीतने के साथ वह बल क्षीण हो चुका है।

समुद्र तट पर जब सभी वानर अपनी-अपनी छलांग लगाने की क्षमता बता रहे थे (जैसे गय ने 10 योजन, गवय ने 20, नल ने 50 आदि), तब अंगद ने कहा कि वे सौ योजन कूदकर लंका जा तो सकते हैं, किंतु लौटते समय उनके बल और ऊर्जा में कमी आ सकती है ।

हनुमान जी को श्राप था कि वे अपनी शक्ति भूले रहेंगे जब तक उन्हें कोई याद नहीं दिला देगा,इसलिए वे तो कुछ भी नहीं बोल पा रहे थे तब जाम्बवंत ने हनुमानजी को उनकी भूली हुई शक्तियाँ याद दिलाईं — बचपन में सूर्य को निगलने की कोशिश और मुनि के श्राप की कहानी सुनाकर। यही वह क्षण था जब श्राप से मुक्ति मिली और हनुमानजी को अपने असली बल का एहसास हुआ ।

हनुमान विराट स्वरूप शक्ति किष्किंधा कांड
हनुमानजी का विराट स्वरूप

जाम्बवंत द्वारा शक्ति याद दिलाते ही हनुमान जी का संकोच और मौन क्षण भर में समाप्त हो गया।उनका शरीर सुवर्ण पर्वत (सुमेरु) के समान अत्यंत विशाल, भव्य और पर्वताकार रूप में बढ़ गया।उनका मुखमंडल और नेत्र सूर्य के समान तेजस्वी होकर युद्ध-वीर के पराक्रम से चमक उठे।उन्होंने आकाश को गुंजायमान करने वाली एक भीषण सिंहगर्जना की, जिससे सभी वानरों में उत्साह भर गया।उनमें असीम आत्मविश्वास जागा ।

हनुमान जी लंका की ओर तीव्र गति से उड़ते होते हुए
हनुमान जी लंका की ओर तीव्र गति से उड़ते होते हुए

जाम्बवंत की आज्ञा पाकर हनुमान जी ने महेंद्र पर्वत से भीषण वेग के साथ छलांग लगाई और समुद्र के ऊपर आकाश मार्ग से तीव्र गति से उड़ते चले गए, जिसे तट पर खड़े जाम्बवंत और अंगद विस्मय और श्रद्धा से देखते रह गए।”यहीं से किष्किन्धाकाण्ड संपूर्ण और सुंदरकांड की कहानी शुरू होती है ।


मूल चौपाई (रामचरितमानस, किष्किंधाकाण्ड)

“कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।।” — जाम्बवंत, हनुमानजी को उनकी शक्ति याद दिलाते हुए (रामचरितमानस, चतुर्थ सोपान)

अर्थ: जगत में ऐसा कौन सा काम कठिन है, जो हे तात (हनुमान), तुमसे न हो सके।

1.किष्किंधा कांड में कितने अध्याय/सर्ग हैं?

वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड में कुल 67 सर्ग (अध्याय) और 2,445 श्लोक हैं। गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस में यही कांड (चतुर्थ सोपान) सिर्फ 30-31 दोहों में समेटा गया है — दोनों ग्रंथों की शैली अलग-अलग होने के कारण यह फ़र्क़ है।

2. किष्किंधा कांड में कितनी चौपाई हैं?

रामचरितमानस के किष्किंधाकाण्ड में 30-31 दोहों के बीच सैकड़ों चौपाइयाँ हैं, जो राम-सुग्रीव मित्रता से लेकर वानर-सेना के प्रस्थान तक की पूरी कथा कहती हैं।

3. किष्किंधा कांड का सारांश क्या है?

किष्किंधा कांड में श्रीराम-हनुमान की भेंट, राम-सुग्रीव की मित्रता, बाली वध, सुग्रीव का राज्याभिषेक, और सीता माता की खोज हेतु वानर-सेना का प्रस्थान — यह पाँच मुख्य घटनाएँ आती हैं।

4. किष्किंधा कांड के बाद कौनसा कांड आता है?

किष्किंधा कांड के बाद सुंदरकांड आता है, जिसमें हनुमानजी समुद्र लांघकर लंका पहुँचते हैं और सीता माता को खोजते हैं।

5. रामायण में सबसे छोटा कांड कौन सा है?

किष्किंधा कांड को अक्सर रामायण का चौथा और सबसे संक्षिप्त कांड कहा जाता है, हालाँकि इसमें कथा की कई महत्वपूर्ण मोड़ आते हैं।

6. किष्किंधा कांड की चौपाई का अर्थ क्या है?

इस कांड की सबसे प्रसिद्ध चौपाई “कवन सो काज कठिन जग माहीं” का अर्थ है — जगत में कोई भी काम हनुमानजी के लिए कठिन नहीं है। ऊपर पूरी चौपाई और अर्थ दिया गया है।

7. सुग्रीव किष्किंधा के राजा कैसे बने?

श्रीराम द्वारा बाली का वध करने के बाद सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाया गया, और बाली के पुत्र अंगद को युवराज घोषित किया गया।

8. हनुमान जी को अपनी ताकत याद किसने दिलाई थी?

जाम्बवंत ने हनुमानजी को समुद्र किनारे उनकी भूली हुई शक्तियाँ याद दिलाईं, जिसके बाद हनुमानजी समुद्र लांघने के लिए तैयार हुए — यह कथा किष्किंधा कांड के अंत में आती है।

मुख्य शब्द (Key Vocabulary)

हिंदी शब्दTransliterationअर्थ (English)
सोपानSopaanCanto/Section
युवराजYuvrajCrown Prince
पखवाराPakhwaraFortnight (15 days)
अशोक वाटिकाAshok VatikaAshoka Garden
सर्गSargaChapter (in Valmiki Ramayana)

बड़ों के लिए भी एक सीख

यह कहानी सिर्फ बच्चों के लिए नहीं — सुग्रीव की धैर्यशीलता और हनुमानजी की निष्ठा हमें भी सिखाती है कि सच्चा साथी वही है जो संकट में साथ खड़ा रहे। जैसा किष्किंधा कांड कहता है — “धीरज रखने वाला और सच्चे मन से सेवा करने वाला ही अंत में जीतता है।”

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