बगुला भगत और केकड़ा की कहानी

| कहानी | स्थान | मुख्य पात्र |
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| बगुला भगत और केकड़ा (पंचतंत्र — मित्रभेद) | एक वन-तालाब और पास की चट्टान | बगुला भगत, चतुर केकड़ा, मछलियाँ, कछुआ, मेंढक |
| स्रोत | पढ़ने का समय | मुख्य सीख |
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| पंचतंत्र, प्रथम तंत्र — मित्रभेद (विष्णु शर्मा, लगभग 2300 वर्ष पूर्व) | ⏱ 7 मिनट | धोखेबाज़ लोगों की मीठी बातों में आसानी से नहीं आना चाहिए |
बगुला भगत और केकड़ा की कहानी पंचतंत्र के प्रथम तंत्र — मित्रभेद की वह प्रसिद्ध नीति-कथा है जिसमें एक धूर्त बगुला मछलियों को झूठा भय दिखाकर एक-एक करके खा जाता है — (विष्णु शर्मा, पंचतंत्र, लगभग 2300 वर्ष पूर्व)। यह कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है — क्योंकि मीठी बातों से ठगने वाले बगुले भगत आज भी हमारे आसपास मिलते हैं।
बगुला भगत कौन था? — असली चरित्र
बगुला भगत एक चालाक बगुला था जो एक घने जंगल में एक बड़े तालाब के पास रहता था । तालाब में मछलियाँ, केकड़े, मेंढक और कछुए सभी मिल-जुलकर रहते थे।

जवानी में वह अच्छा शिकारी था । तेज़, चालाक, पेट भर खाने वाला लेकिन अब बुढ़ापे ने उसकी आँखें कमज़ोर कर दीं, पंजों में ताकत नहीं रही। मछलियाँ पकड़ना अब संभव नहीं था पर उसका मन अभी भी उतना ही चालाक था। एक दिन वह तालाब के किनारे एक टाँग पर खड़ा हो गया और आँसू बहाने लगा।
बगुला भगत की चाल — झूठ का जाल कैसे बिछाया?
एक कछुआ वहाँ से गुजर रहा था । वहाँ किनारे पर बगुले को रोते देख तो रुक गया। बोला “मामा, क्या हुआ? आप परेशान क्यों है ?” बगुले ने एक गहरी हिचकी ली और भर्राई आवाज़ में बोला —“बेटे, मुझे इस तालाब से बहुत लगाव है मगर अब इस तालाब में रहना किसी के लिए संभव नहीं रहेगा।”
“क्यों मामा?” कछुए ने चौंककर पूछा।
“एक भविष्यवक्ता आया था। उसने बताया — यह तालाब कुछ ही दिनों में सूख जाएगा। यहाँ के सभी जीव मर जाएंगे। मेरा मन रो रहा है बेटे — इन मछलियों, अन्य प्राणियों देखकर।” कछुए ने यह बात सुनी और तालाब में जाकर सबको बता दी।पल भर में पूरा तालाब दहशत में डूब गया। मछलियाँ इधर-उधर भागने लगीं। मेंढक काँपने लगे। कछुए अपने खोल में घुस गए।
जब सभी डर के मारे बगुले के पास पहुँचे और बोले — “मामा, हमें बचाओ!” बगुला बोला — “मैं बूढ़ा हूँ, कमज़ोर हूँ पर तुम सबके लिए मैं एक काम करूँगा। एक-एक को अपनी पीठ पर बिठाकर पास के बड़े तालाब तक पहुँचाऊंगा। वहाँ तुम सब सुरक्षित रहोगे । सब मछलियाँ उसके झांसे मे या गई और बोली कितना दयालु बुज़ुर्ग है !
बगुला भगत का असली खेल — चट्टान पर क्या होता था?
अब रोज़ बगुला एक मछली को प्यार से चोंच में पकड़ता — उड़ता — और तालाब की दिशा में नहीं, बल्कि पास की एक चट्टान की ओर जाता। वहाँ पहुँचकर मछली को पटकता और खा जाता। दिन-दर-दिन यही होता रहा। बगुले का पेट भरता रहा। तालाब खाली होता रहा।

तब एक केकड़े ने सवाल पूछा जो किसी ने नहीं पूछा था। “मामा, यह भविष्यवक्ता कहाँ है? हमने तो नहीं देखा। और तालाब सूखता है तो पहले किनारे सूखते हैं ,वह तो वैसे ही हैं जैसे थे। यह बात मुझे समझ नहीं आई।”
यह सुनकर बगुला गुस्से में आ गया मगर उसने सोच लिया कि अब अगला नंबर केकड़े का ही लेना होगा नहीं तो सब इसकी तरह पूछने लगेंगे तो मेरा भांडा फूट जाएगा । वह दिखावटी अपनापन दिखाते हुए केकड़े से बोला“बेटे, अब तुम्हारी बारी है। चलो, तुम्हें भी सुरक्षित पहुँचाता हूँ।”
केकड़ा बगुले की चोंच में नहीं पीठ पर बैठ गया लेकिन उसने अपने मज़बूत पंजे बगुले की गर्दन के पास कसकर जमा लिए। जैसे-जैसे बगुला उड़ता गया, केकड़े की आँखें खुली थी

उसने जब नीचे चट्टान के पास मछलियों की हड्डियों का ढेर देखा। उसी एक पल में सारा सच सामने आ गया। केकड़े ने बगुले की गर्दन पर अपने पंजे कस दिए।
“मामा, यह तालाब कहाँ है? नीचे तो सिर्फ हड्डियाँ दिख रही हैं।” बगुला हड़बड़ाया — “छोड़ो! दम घुट रहा है!”
केकड़ा धमकाते हुए बोला “वापस तालाब पर चलो। अभी। वरना यहीं दोनों का अंत होगा।” बगुले ने तड़पकर छुड़ाने की कोशिश की पर केकड़े की पकड़ चट्टान जैसी थी। आखिरकार बगुला वापस तालाब की ओर मुड़ा।
बगुला और केकड़ा की कहानी का अंत — न्याय का क्षण
तालाब पर उतरते ही सब ने देखा कि केकड़े ने सबके प्रिय बगुले की गर्दन जकड़ रखी है और वह दर्द से छटपटा रहा है तो सभी को केकड़े पर गुस्सा आया । बगुला दर्द में सब के सामने बोला “मुझे माफ कर दो,अब मैं किसी को नहीं खाऊँगा और यह तालाब ही छोड़ दूंगा अब मुझे छोड़ दो ।”

केकड़े ने बगुले के सबके सामने गलती स्वीकार करते ही अपने पंजे पूरी ताकत से उसकी गर्दन में घुसा कर उसे मार डाला और बोला —
“भाइयों, बगुला भगत ने हमें धोखा दिया। वह किसी को बड़े तालाब नहीं ले गया — सबको चट्टान पर ले जाकर खा गया। मैंने वहाँ हड्डियाँ देखीं। अब वह मर चुका है। हम सब सुरक्षित हैं।”
तालाब में सभी आश्चर्य और शोक में पड़ गए लेकिन सब राहत की सांस ली । सभी ने केकड़े को धन्यवाद दिया।
बगुला भगत और केकड़ा से बच्चों को क्या सीख मिलती है?
- पंचतंत्र की यह कहानी यह सिखाती है कि कभी किसी पर आँख बंद करके भरोसा मत करो मछलियाँ डर के कारण सोचना भूल गईं। केकड़े ने सवाल पूछा। यही फर्क जीवन और मृत्यु का बन गया।
*सवाल पूछना बुज़दिली नहीं — समझदारी है जब केकड़े ने सवाल पूछा तो किसी ने नहीं सुना। पर वह चुप नहीं बैठा — देखता रहा, सोचता रहा। यही उसकी सबसे बड़ी ताकत थी।
*हिम्मत छोटे कद से नहीं नापी जाती केकड़ा छोटा था। बगुला भगत बड़ा और उड़ने वाला। फिर भी केकड़ा जीता — क्योंकि उसके पास सच था और साहस था।
*धोखा हमेशा मीठे मुँह से आता है बगुला कभी नहीं डराता — वह रोता है, दयालु बनता है, “बेटे-बेटे” कहता है। असली खतरा यही होता है जो प्यार का चेहरा पहनकर आए।
प्रश्न 1: बगुला भगत ने मछलियों को क्या झूठ बोला था?
बगुले ने कहा कि एक भविष्यवक्ता ने बताया है कि यह तालाब जल्द सूख जाएगा और सभी जीव मर जाएंगे। यह बात पूरी तरह झूठी थी — बगुले ने अपने भोजन के लिए यह चाल सोची थी।
प्रश्न 2: केकड़े ने बगुले से क्या कहा था?
केकड़े ने शुरू में ही सवाल उठाया था कि यह भविष्यवक्ता कहाँ है और तालाब सूखने के कोई संकेत नहीं दिखते। जब आसमान में उड़ते हुए उसने हड्डियाँ देखीं, तब उसने बगुले की गर्दन पकड़ी और कहा — “वापस तालाब पर चलो, वरना यहीं दोनों का अंत होगा।”
प्रश्न 3: बगुला भगत की कहानी में केकड़े को सच कैसे पता चला?
जब बगुला केकड़े को लेकर उड़ा, तब केकड़े ने नीचे देखा और चट्टान के पास मछलियों की हड्डियों का ढेर देखा। उसी पल उसे समझ आ गया कि बगुला सबको धोखे से वहाँ ले जाकर खा रहा था।
प्रश्न 4: केकड़े और बगुले की कहानी का अंत क्या हुआ?
केकड़े ने बगुले को वापस तालाब पर उतरने पर मजबूर किया और वहाँ उसकी गर्दन काट दी। फिर सबको सच बताया — कि बगुला भगत दरअसल धोखेबाज़ था।
प्रश्न 5: बगुला और केकड़ा की कहानी क्या है — संक्षेप में?
यह पंचतंत्र की कहानी है जिसमें एक बूढ़ा बगुला झूठी भविष्यवाणी से मछलियों को डराकर एक-एक करके खाता है। केकड़ा शुरू से सशंकित था — और जब उसकी बारी आई, तब उसने हड्डियाँ देखकर सच जाना और बगुले का अंत किया।
प्रश्न 6 : बगुला भगत कौन था?
बगुला भगत एक चालाक बगुला था जो एक घने जंगल में एक बड़े तालाब के पास रहता था ।
डैडी की बात
जब मैं यह कहानी बच्चों सुनाता हूँ, तो एक सवाल ज़रूर पूछता हूँ —
“बेटा, अगर तुम उस तालाब में होते — तो क्या तुम बगुले पर भरोसा करते?” वो सोचता है। कभी हाँ, कभी ना फिर मैं कहता हूँ “जो डर दिखाकर तुम्हें जल्दी फैसला करवाए — उस पर सबसे ज़्यादा शक करो।”
यही पंचतंत्र हमें सिखाता है और यही मैं बच्चों को सिखाना चाहता हूँ।
आज रात यह कहानी सुनाएं। फिर पूछें — “तुम केकड़े जैसे बनोगे या मछली जैसे?” कमेन्ट में जवाब जरूर देना ।
— Devendra, TellMeStoryDaddy…


